
मसूरी: उत्तराखंड राज्य निर्माण की रजत जयंती पर पूरे प्रदेश में जश्न मनाया गया, लेकिन मसूरी के राज्य आंदोलनकारियों के लिए यह दिन गर्व के साथ-साथ गहरी पीड़ा लेकर आया। आंदोलनकारियों ने कहा कि “राज्य के लिए मसूरी ने रक्त दिया, बलिदान दिया, लेकिन सम्मान कहीं और दिया जा रहा है। यह हमारे शहीदों की आत्मा का अपमान है।”
मसूरी के आंदोलनकारियों का दर्द उभरा
राज्य निर्माण की 25वीं वर्षगांठ पर मसूरी के आंदोलनकारियों ने प्रशासन और सरकार पर गहरा आक्रोश जताया। आंदोलनकारियों ने कहा कि मसूरी में 6 आंदोलनकारी और एक पुलिस अधिकारी शहीद हुए, जबकि चार दर्जन से अधिक आंदोलनकारी जेल गए।
उन्होंने कहा —
“मसूरी ने राज्य निर्माण की चिंगारी जलाई थी, मसूरी ने रक्त और बलिदान दिया था। लेकिन आज जब जश्न का वक्त आया, तो सम्मान देहरादून और अन्य जगहों को दिया जा रहा है। यह मसूरी के शहीदों के साथ अन्याय है।”
‘जहां चिंगारी जली, वहीं सम्मान होना चाहिए’
मसूरी के राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि यह वही धरती है, जहां राज्य की मांग के लिए जनता ने अपनी जानें कुर्बान कीं। उन्होंने कहा कि 25 वर्ष बाद भी मसूरी को राज्य आंदोलन का केंद्र मानने में सरकार हिचक रही है।
“जब मसूरी ने राज्य की नींव रखी, तो रजत जयंती का सबसे बड़ा सम्मान भी यहीं से शुरू होना चाहिए था।”
थराली के आंदोलनकारियों ने भी उठाई आवाज
इसी तरह चमोली जिले के थराली में आयोजित राज्य आंदोलनकारी सम्मान समारोह में भी आंदोलनकारियों का दर्द झलका। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य बनने के 25 साल बाद भी राज्य निर्माण की अवधारणा अधूरी है।
“पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की दुर्दशा आज भी वहीं खड़ी है, जहां 25 साल पहले थी। खेत बंजर हैं, स्कूल खाली हैं और अस्पतालों में डॉक्टर नहीं।”
थराली में रखी गई स्थानीय मांगें
आंदोलनकारियों ने थराली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को उप जिला चिकित्सालय में उच्चीकृत करने और अल्ट्रासाउंड मशीन लगाने की मांग की। साथ ही, उन्होंने पलायन रोकने, जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा, और आपदा से निपटने के संसाधन बढ़ाने की बात कही। उन्होंने थराली घाट, कसबीनगर और खनसर मोटरमार्ग के शीघ्र निर्माण और सड़कों को गड्ढा मुक्त करने की भी मांग रखी।
“स्थायी राजधानी कब?” — आंदोलनकारियों का सवाल
राज्य आंदोलनकारियों ने गैरसैंण को स्थायी राजधानी न बनाए जाने पर भी गहरी नाराजगी व्यक्त की।
“उत्तराखंड बने 25 साल हो गए, लेकिन गैरसैंण अब तक राजधानी नहीं बन पाई। अगर गैरसैंण राजधानी होती, तो पहाड़ों में उद्योग लगते, रोजगार बढ़ता और पलायन रुकता।”
उन्होंने कहा कि हर सरकार ने गैरसैंण का सिर्फ राजनीतिक उपयोग किया है, लेकिन किसी ने इसे राज्य के भविष्य का केंद्र नहीं बनाया।
जनता की भावना – “बलिदान का सम्मान होना चाहिए”
मसूरी और थराली के आंदोलनकारियों का कहना है कि राज्य की असली आत्मा उन लोगों में बसती है, जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया।
“हमारा सम्मान भाषणों से नहीं, बल्कि नीति और निर्णयों से होना चाहिए।”







