
देहरादून: शनिवार, 24 जनवरी को देहरादून में उत्तर-पूर्व छात्र संघ, देहरादून द्वारा आयोजित 24 घंटे की शांतिपूर्ण भूख हड़ताल को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ऑल इंडिया चकमा स्टूडेंट्स यूनियन ने आरोप लगाया कि अंजेल चकमा को न्याय दिलाने की मांग को लेकर किए जा रहे इस अहिंसक और प्रतीकात्मक धरने को पुलिस ने बिना पूर्व सूचना के हटाया। छात्र संगठनों का कहना है कि कार्रवाई से प्रदर्शनकारियों में अफरा-तफरी और मानसिक दबाव की स्थिति बनी, जबकि धरना पूरी तरह अनुशासित और गैर-हिंसक था।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
छात्र संगठनों के अनुसार यह भूख हड़ताल पूरी तरह अनुशासित, अहिंसक और प्रतीकात्मक थी, जिससे सार्वजनिक आवागमन या कानून-व्यवस्था में कोई बाधा नहीं उत्पन्न हुई। इसके बावजूद पुलिस द्वारा प्रदर्शन स्थल पर टेंट हटाने से हड़ताल में शामिल छात्रों में अफरा-तफरी और मानसिक तनाव की स्थिति पैदा हो गई।
छात्र संगठनों के आरोप
All India Chakma Students’ Union ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से की जा रही भूख हड़ताल को संवाद के बजाय बल से दबाया गया। संगठन का कहना है कि यह कार्रवाई लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है और इससे छात्रों की आवाज को दबाने का प्रयास किया गया।
अंजेल चकमा मामला
छात्र संगठन के अनुसार अंजेल चकमा, जो त्रिपुरा के रहने वाले थे, पर 9 दिसंबर 2025 को देहरादून के सेलाकुई क्षेत्र में हमला किया गया। आरोप है कि हमले से पहले उन्हें और उनके भाई को नस्लीय गालियां दी गईं और “चीनी” कहकर पुकारा गया। इसके बाद चाकू और धातु के कड़े से हमला किया गया, जिसमें अंजेल गंभीर रूप से घायल हो गए। 17 दिनों तक अस्पताल में इलाज के बाद 26 दिसंबर 2025 को उनकी मौत हो गई।
देशभर में विरोध प्रदर्शन
अंजेल चकमा की मौत के बाद देहरादून, त्रिपुरा, दिल्ली और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए। हजारों छात्रों ने कैंडल मार्च और रैलियों में भाग लेते हुए “Stop Racism”, “We Are Indians” और “We Want Justice” जैसे नारे लगाए। पुलिस ने इस मामले में छह आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल हैं।
जांच को लेकर सवाल
छात्र संगठनों का आरोप है कि राष्ट्रीय स्तर पर मामला उठने के बावजूद जांच की गति धीमी है और पारदर्शिता की कमी बनी हुई है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण भूख हड़ताल पर कार्रवाई प्रशासन की असंवेदनशीलता को दर्शाती है, खासकर उन छात्रों के प्रति जो अपने गृह राज्यों से बाहर पढ़ाई कर रहे हैं।
एआईसीएसयू की मांग
एआईसीएसयू ने प्रशासन से सवाल उठाए हैं कि अब तक संवाद का रास्ता क्यों नहीं अपनाया गया, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी और न्याय प्रक्रिया में देरी क्यों हो रही है। संगठन ने चेतावनी दी है कि शांतिपूर्ण विरोध जैसे मौलिक अधिकारों को दबाना एक खतरनाक परंपरा को जन्म देता है, जिसका असर हाशिए पर खड़े समुदायों पर अधिक पड़ता है।
आगे क्या होगा
छात्र संगठनों ने स्पष्ट किया है कि अंजेल चकमा को पूर्ण न्याय मिलने तक उनका शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रहेगा। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक जिला प्रशासन की ओर से भूख हड़ताल हटाने को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।





