
देहरादून: उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ने के बाद वन विभाग अतिरिक्त सतर्कता के मोड में आ गया है। पहली बार वन मुख्यालय ने खास स्थिति को देखते हुए गढ़वाल के चार जिलों में वरिष्ठ अधिकारियों को नोडल अधिकारी के रूप में नियुक्त कर दिया है। गुलदार और भालू के बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों के साथ विभाग की चुनौतियां भी बढ़ा दी हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बीते महीनों से गुलदार और भालू के हमलों में तेजी आई है। दिनदहाड़े घरों के आंगन तक पहुंच रहे गुलदार ग्रामीणों के लिए दहशत का कारण बने हुए हैं। वहीं भालुओं के हमलों ने खतरा और बढ़ा दिया है। इन निरंतर घटनाओं से मानव-वन्यजीव संघर्ष नए स्तर पर पहुंच गया है, जिसके चलते ग्रामीणों की सुरक्षा और वन विभाग की जिम्मेदारी दोनों चुनौतीपूर्ण हो गई हैं।
आधिकारिक जानकारी
वन विभाग ने संघर्ष की गंभीरता को देखते हुए चार वरिष्ठ अधिकारियों को जिलों में नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। इनमें पौड़ी के लिए अपर प्रमुख वन संरक्षक नरेश कुमार, रुद्रप्रयाग के लिए मुख्य वन संरक्षक राहुल, चमोली के लिए मुख्य वन संरक्षक पीके पात्रो और उत्तरकाशी के लिए सुशांत कुमार पटनायक को नामित किया गया है।
इन अधिकारियों को संघर्ष प्रबंधन, राहत, निगरानी और उच्च स्तर से मिले निर्देशों के पालन की विशेष जिम्मेदारी दी गई है। वन विभाग के प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) रंजन कुमार मिश्र ने कहा कि बढ़ते मामलों के बीच नोडल अधिकारियों की नियुक्ति जरूरी हो गई थी ताकि हालात पर लगातार निगरानी रखी जा सके।
स्थानीय प्रतिक्रिया
ग्रामीणों का कहना है कि पिछले महीनों में गुलदारों और भालुओं की संख्या रिहायशी इलाकों में बढ़ गई है। कई गांवों में लोग शाम होते ही घरों से बाहर निकलने से कतराते हैं। ग्रामीणों ने विभाग से मांग की है कि प्रभावित क्षेत्रों में गश्त, पिंजरे लगाने और त्वरित बचाव कार्य बढ़ाए जाएं।
विशेषज्ञ टिप्पणी
वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों का दबाव, भोजन की कमी या पर्यावरणीय बदलाव के चलते वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रिस्क मैपिंग और हॉटस्पॉट की पहचान संघर्ष रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आगे क्या
नोडल अधिकारी संघर्षग्रस्त क्षेत्रों की स्थिति का विश्लेषण करेंगे, सुरक्षा उपायों की समीक्षा करेंगे और तुरंत राहत सुनिश्चित कराएंगे। पीड़ित परिवारों को जल्दी मुआवजा, जरूरी उपकरणों की उपलब्धता और डीएफओ की जनसुनवाई में अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होगी। विभाग आने वाले दिनों में संघर्ष रोकथाम के लिए व्यापक रणनीति लागू करने की तैयारी में है।





