
चमोली: उत्तराखंड में जंगल की आग को लेकर बनी पारंपरिक धारणा इस सर्दी में टूटती नजर आई है। आमतौर पर समुद्र तल से 2,000 मीटर तक सीमित रहने वाली वनाग्नि इस बार 3,000 मीटर से ऊपर तक पहुंच गई। चमोली जिले में स्थित नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान जनवरी माह में आग की चपेट में आ गया, जिसे उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी का सबसे संवेदनशील और संरक्षित क्षेत्र माना जाता है। यह घटना केवल असामान्य नहीं, बल्कि बदलते जलवायु पैटर्न और सूखे मौसम के संकेत भी देती है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान उच्च हिमालयी जैवविविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है। सर्दियों में यहां आमतौर पर बर्फ और नमी बनी रहती है, जिससे आग की आशंका नगण्य मानी जाती रही है। लेकिन इस बार हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी के बेसकैंप घांघरिया से निकट गोविंदघाट रेंज में आग लगने से विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।
आधिकारिक जानकारी
बद्रीनाथ वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी सर्वेश दुबे के अनुसार 9 जनवरी को आग की सूचना मिली, जो विभाग के लिए भी अप्रत्याशित थी। प्रारंभिक हवाई सर्वेक्षण में सामने आया कि आग 3,500 मीटर के आसपास अत्यंत खड़ी, 70 से 80 डिग्री ढलान वाले चट्टानी क्षेत्र में लगी थी, जहां पहुंचना जोखिमभरा है। पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में आग की कोई घटना दर्ज नहीं हुई थी।
दुर्गम क्षेत्रों में आग बुझाने की चुनौती
समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊंचाई और नदी तल से करीब 1,500 मीटर ऊपर स्थित इस इलाके में जंगल करीब छह दिनों तक धधकते रहे। भेजे गए वन विभागीय दल खड़ी ढलानों, पत्थर गिरने के खतरे और असुरक्षित मार्गों के कारण बार-बार लौटने को मजबूर हुए। अगले चरण में लक्ष्मण गंगा नदी पर अस्थायी पुल बनाकर भ्यूंडार वन बीट तक पहुंच बनाई गई। ड्रोन से स्थिति का आकलन किया गया और स्थानीय ग्रामीणों व महिला मंगल दल की मदद से प्रयास हुए, लेकिन कठिन परिस्थितियों के कारण पूर्ण नियंत्रण में समय लगा।
विशेषज्ञों की राय
पीपलकोटी क्षेत्र में ग्रामीण विकास और आजीविका से जुड़े कार्य कर रहे जेपी मैठाणी इसे हिमालयी वनों के लिए गंभीर चेतावनी मानते हैं। उनके अनुसार यह पहली बार है जब आग निचले इलाकों से ऊपर की ओर बढ़ने के बजाय सीधे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में शुरू हुई। सर्दियों में बारिश और बर्फबारी न होने से जंगलों की नमी खत्म हो चुकी है, गाड़-गदेरे सूख गए हैं और दोपहर की तेज धूप के साथ लगातार सूखा मौसम आग के फैलाव को बढ़ावा दे रहा है।
आगे क्या होगा
वन विभाग उच्च हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, ड्रोन सर्विलांस और स्थानीय सहभागिता को मजबूत करने पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु अनुकूलन रणनीतियों, प्रारंभिक चेतावनी तंत्र और शीतकालीन आग प्रबंधन पर तत्काल ध्यान देना होगा, ताकि संवेदनशील पारिस्थितिकी की रक्षा की जा सके।







