
देहरादून: अंकिता भंडारी हत्याकांड में एक के बाद एक नई एंट्री ने मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पहले उर्मिला सनावर और फिर स्वामी दर्शन भारती की भूमिका पर सवाल उठे, अब पद्मश्री सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता अनिल जोशी द्वारा अज्ञात VIP के खिलाफ दर्ज कराई गई FIR ने पूरे प्रदेश में नई बहस छेड़ दी है। इस FIR को लेकर न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल है, बल्कि इसकी वैधता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
अंकिता भंडारी हत्याकांड बीते तीन वर्षों से उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक विमर्श का संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। हाल के दिनों में मामले में सीबीआई जांच की संस्तुति के बाद घटनाक्रम ने तेजी पकड़ ली है।
अनिल जोशी की FIR से बदला घटनाक्रम
पद्मश्री अनिल जोशी की शिकायत पर अज्ञात VIP के खिलाफ मुकदमा दर्ज होते ही मामले ने नया मोड़ ले लिया। खास बात यह है कि पिछले तीन वर्षों में अनिल जोशी ने इस प्रकरण पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया था। ऐसे में सीबीआई जांच की संस्तुति के तुरंत बाद उनकी एंट्री और FIR दर्ज होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
परिजनों का पत्र भी विवेचना में शामिल
बताया गया है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता के माता-पिता की मांग पर सीबीआई जांच की संस्तुति की थी। शुरुआती तौर पर FIR अनिल जोशी की तहरीर पर दर्ज हुई, लेकिन बाद में पुलिस ने विवेचना में अंकिता के माता-पिता द्वारा मुख्यमंत्री को दिया गया वह पत्र भी शामिल किया, जिसमें सीबीआई जांच की मांग की गई थी।
पुलिस का पक्ष
देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय सिंह ने बताया कि अंकिता के परिजनों का पत्र अब अनिल जोशी द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे की विवेचना का हिस्सा बना दिया गया है और आगे सीबीआई जांच में भी इसे आधार बनाया जाएगा।
FIR बनी CBI जांच की संस्तुति का आधार
इस पूरे मामले में यही FIR सीबीआई जांच की संस्तुति का प्रमुख आधार बनी है। हालांकि, इसी बिंदु पर विवाद भी खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ता अजय नारायण शर्मा समेत कई लोगों ने इस FIR और अनिल जोशी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
FIR की वैधता पर सवाल
इस मामले में एक अहम तथ्य यह भी सामने आया है कि यह FIR सीधे तौर पर अंकिता के परिजनों की तहरीर पर दर्ज नहीं की गई है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि यदि भविष्य में अनिल जोशी इस मुकदमे को वापस लेने का निर्णय लेते हैं, तो क्या परिजनों के पत्र के आधार पर सीबीआई जांच आगे बढ़ेगी या नहीं।
सोशल एक्शन कमेटी की आपत्ति
सोशल एक्शन कमेटी ने इस FIR को गैरकानूनी बताते हुए पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई है। कमेटी का कहना है कि मुकदमा किसी तीसरे व्यक्ति की ओर से दर्ज होना, जबकि वह न तो पीड़ित पक्ष है और न ही परिजन, पूरे मामले को कानूनी रूप से कमजोर कर सकता है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि अंकिता को न्याय दिलाने के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष जांच जरूरी है। FIR को लेकर उपजे विवाद से आम जनता में भ्रम की स्थिति बन रही है।
आगे क्या होगा
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सीबीआई जांच किस आधार पर आगे बढ़ती है और FIR से जुड़े कानूनी सवालों पर क्या स्पष्टता सामने आती है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं और तेज हो सकती हैं।







