
त्यूणी: देहरादून जनपद के त्यूणी क्षेत्र स्थित कयलू मंदिर हनोल में शुक्रवार को विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ चुराच का पहला बकरा चढ़ाया गया। इसके साथ ही जौनसार बावर क्षेत्र में एक माह तक चलने वाले पारंपरिक लोक पर्व माघ मरोज की विधिवत शुरुआत हो गई। इस पर्व का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व बेहद गहरा माना जाता है, जिसमें अतिथि सत्कार, सामूहिक भोज और लोकनृत्य के माध्यम से पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखा जाता है। माघ मरोज न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व है, बल्कि यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक माना जाता है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
लोक मान्यताओं के अनुसार पौष माह की 26वीं तिथि को चुराच का बकरा चढ़ाने की परंपरा रही है। टोंस और यमुना घाटी से जुड़े पर्वतीय क्षेत्रों में माघ मरोज पर्व सदियों से मनाया जा रहा है। इस दौरान लोग अपने रिश्तेदारों और परिचितों को आमंत्रित कर पारंपरिक सहभोज का आयोजन करते हैं। पंचायती आंगन सांस्कृतिक गतिविधियों से गुलजार रहते हैं, जहां लोकगीत और नृत्य विशेष आकर्षण होते हैं।
आधिकारिक जानकारी
स्थानीय धार्मिक समितियों और आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार, सभी धार्मिक अनुष्ठान परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुरूप संपन्न कराए जा रहे हैं। प्रशासन की ओर से किसी प्रकार की औपचारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। अधिकारी टिप्पणी करने से बचते दिखे।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि माघ मरोज पर्व से समाज में आपसी मेल-जोल बढ़ता है और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति को समझने का अवसर मिलता है। वहीं बुजुर्गों ने बताया कि यह पर्व सामाजिक एकता और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।
आंकड़े / जानकारी
जौनसार बावर क्षेत्र की कुल 39 खतों में माघ मरोज पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा सीमावर्ती उत्तरकाशी जनपद के बंगाण क्षेत्र, रवांई घाटी के जौनपुर और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र में भी यह लोक पर्व परंपरागत रूप से आयोजित किया जाता है।
आगे क्या होगा
शनिवार को बावर-देवघार क्षेत्र से जुड़ी 11 खतों में किसराट लोक पर्व मनाया जाएगा। इसके बाद रविवार और सोमवार को जौनसार बावर की अन्य खतों में भी पारंपरिक उत्सव शुरू होंगे। किसराट के दिन घरों में लाल चावल और उड़द की खिचड़ी, जिसे मशियाड़ा भात कहा जाता है, विशेष रूप से बनाई जाएगी।







