
देहरादून: उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और पर्यटन प्रधान राज्य में अब ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर पर्यटकों की जवाबदेही तय की जाएगी। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के तहत पर्यटकों से यूजर चार्ज वसूलने की नई व्यवस्था की गई है। यह नियम 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे। इससे जहां स्थानीय निकायों की आय में बढ़ोतरी होगी, वहीं बढ़ते पर्यटन दबाव के बीच कचरा प्रबंधन को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। नए प्रावधानों के अनुसार निकायों को यह अधिकार भी मिलेगा कि वे उपलब्ध अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं की क्षमता के आधार पर पर्यटकों के आगमन को नियंत्रित कर सकें।
मामले की अहमियत
पर्यटन सीजन में उत्तराखंड के शहरों और पर्वतीय इलाकों में कचरे का दबाव कई गुना बढ़ जाता है। इससे न केवल नगर निकायों पर बोझ पड़ता है, बल्कि पहाड़ों और जलस्रोतों के प्रदूषित होने का खतरा भी रहता है। यूजर चार्ज की व्यवस्था से पर्यटकों की भागीदारी और जिम्मेदारी तय होने की उम्मीद है।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी स्थितियां
पिछले वर्षों में पर्यटन स्थलों पर प्लास्टिक और अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के कारण पर्यावरणीय समस्याएं सामने आती रही हैं। कई स्थानों पर कचरा निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने से स्थानीय लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है।
आधिकारिक जानकारी
नए नियमों के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित नगर निकायों में गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए विशेष संग्रहण केंद्र स्थापित किए जाएंगे, ताकि प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट पहाड़ों व जलस्रोतों तक न पहुंच सकें। स्थानीय निवासियों को कचरा निकायों को सौंपने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जबकि खुले में कूड़ा फैलाने पर सख्ती बरती जाएगी। होटल और रेस्तरां को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तय मानकों के अनुसार गीले कचरे का प्रसंस्करण अनिवार्य रूप से करना होगा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन से रोजगार तो मिलता है, लेकिन कचरे की समस्या भी बढ़ती है। यूजर चार्ज से उम्मीद है कि सफाई व्यवस्था सुधरेगी और पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होगा।
विशेषज्ञ की राय
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी राज्यों में कचरा प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती है। पर्यटकों की जवाबदेही तय किए बिना स्थायी समाधान संभव नहीं, इसलिए यह कदम लंबे समय में फायदेमंद साबित हो सकता है।
आंकड़े और तथ्य
राज्य में प्रतिदिन लगभग 2,132 टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न हो रहा है। उत्तराखंड में कुल 61 लेगेसी वेस्ट डंप साइटें हैं, जहां करीब 23.5 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा है। अब तक केवल लगभग 45 प्रतिशत लेगेसी वेस्ट का ही निपटान हो सका है। देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में अपशिष्ट प्रबंधन बड़ी चुनौती बना हुआ है।
आगे क्या होगा
नए नियम लागू होने के बाद थोक अपशिष्ट उत्पादकों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। शहरी विकास विभाग के अनुसार राज्य में 3,000 से अधिक थोक अपशिष्ट उत्पादक चिन्हित किए जाएंगे, जिन्हें अपने परिसर में कचरे का संग्रहण, पृथक्करण और प्रसंस्करण स्वयं करना होगा। सरकार का मानना है कि इससे नगर निकायों पर बोझ कम होगा और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अधिक प्रभावी बन सकेगा।




