
देहरादून: उत्तराखंड में रिवर्स पलायन को लेकर सरकार के दावों के बीच सियासत तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस मुद्दे पर धामी सरकार को घेरते हुए सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि सरकार रिवर्स पलायन की बात कर रही है, लेकिन पहले उत्तराखंडवासियों को उनकी जमीन लौटाए। उनका कहना है कि पलायन रोकने और रिवर्स पलायन तभी संभव होगा, जब गांवों में सुरक्षा, आजीविका और संभावनाएं हों।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड में लंबे समय से पलायन एक बड़ी चुनौती रहा है। पहाड़ी इलाकों से रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लोग शहरों की ओर जाते रहे हैं। सरकार रिवर्स पलायन के जरिए खाली हो चुके गांवों को फिर से बसाने की बात कर रही है, लेकिन विपक्ष जमीनी समस्याओं की ओर ध्यान दिला रहा है।
आधिकारिक जानकारी
हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रिवर्स पलायन को लेकर अधिकारियों के साथ बैठक कर दिशा-निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने पिछले चार–पांच वर्षों में रिवर्स पलायन को प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए हैं और यह विषय सरकार की प्राथमिकताओं में है।
स्थानीय / मानवीय प्रतिक्रिया
ग्रामीणों का कहना है कि रोजगार और सुरक्षा के बिना गांवों में लौटना कठिन है। खेतों को जंगली जानवरों से नुकसान, आवारा पशुओं की समस्या और सीमित सुविधाएं लोगों को वापस लौटने से रोकती हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर लिखा कि रिवर्स पलायन की बात से पहले मौजूदा पलायन को रोका जाना चाहिए। उन्होंने जंगली जानवरों—गुलदार, बाघ, हाथी, भालू—के हमलों, साथ ही आवारा पशुओं और कुत्तों की समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कारणों से गांवों का जीवन मुश्किल हो गया है। उनका तर्क है कि संभावनाएं नष्ट करके रिवर्स पलायन का सपना नहीं देखा जा सकता।
संख्या / तथ्य
राज्य के कई गांवों में स्थायी आबादी बेहद कम रह गई है। कई स्थानों पर केवल बुजुर्ग रह गए हैं और लोग विशेष अवसरों पर ही गांव लौटते हैं।
आगे क्या होगा
सरकार का कहना है कि रोजगार और स्वरोजगार योजनाओं के माध्यम से गांवों को फिर से आबाद किया जाएगा। वहीं विपक्ष जमीनी सुरक्षा, भूमि से जुड़े मुद्दों और वन्यजीव प्रबंधन पर ठोस कदम उठाने की मांग कर रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।







