
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट में शिक्षा विभाग में कथित रूप से अपात्र दिव्यांगता प्रमाणपत्रों के आधार पर आरक्षण का लाभ लेने वाले कार्मिकों की जांच से संबंधित जनहित याचिका पर बुधवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान विभागीय निदेशक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए और जांच के लिए समय मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए उन्हें एक सप्ताह का समय दिया। अगली सुनवाई 28 नवंबर को होगी।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
राज्य बनने के बाद शिक्षा विभाग में दिव्यांग आरक्षण के तहत 52 पदों पर नियुक्तियां की गई थीं। शिकायत के अनुसार इनमें से कई नियुक्तियां ऐसे लोगों को मिलीं, जिनके दिव्यांग प्रमाणपत्र पर संदेह जताया गया है। इस मामले को नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड की उत्तराखंड शाखा ने जनहित याचिका के रूप में हाईकोर्ट में उठाया। याचिका में मांग की गई है कि अपात्र प्रमाणपत्रों की जांच कर वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों के अधिकारों की रक्षा की जाए।
अधिकारिक जानकारी
सुनवाई के दौरान शिक्षा विभाग के निदेशक ने कोर्ट को बताया कि वह हाल ही में विभाग में नियुक्त हुए हैं और उन्हें संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण करने के लिए समय चाहिए। कोर्ट ने उन्हें एक सप्ताह का समय देते हुए स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई से पहले जांच की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
इससे पहले अदालत राज्य मेडिकल बोर्ड के महानिदेशक को नोटिस जारी कर चुकी है। मेडिकल बोर्ड के पुनर्मूल्यांकन (2022) में 52 में से केवल 13 उम्मीदवारों के प्रमाणपत्र सही पाए गए थे। शेष लोग या तो जांच में अनुपस्थित रहे या उनके प्रमाणपत्रों में असंगतियां पाई गईं।
स्थानीय प्रतिक्रिया
शिक्षा विभाग में दिव्यांग कोटे से हुई संभावित गड़बड़ियों को लेकर सामाजिक संगठनों में नाराजगी है। उनका कहना है कि यदि अपात्र लोग लाभ ले रहे हैं, तो इससे वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवारों को नुकसान होता है। नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों में इस मामले ने विशेष रूप से चर्चा को जन्म दिया है।
याचिकाकर्ता के आरोप
नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड की ओर से दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई कर्मचारियों ने ‘दृष्टिबाधित’ श्रेणी के तहत आरक्षण प्राप्त किया, जबकि वे पात्रता के मानकों पर खरे नहीं उतरते। याचिका में यह भी कहा गया कि 2022 में मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई जांच में कई कर्मचारी जानबूझकर अनुपस्थित रहे, जिससे उनके प्रमाणपत्रों की वैधता पर संदेह गहरा हो जाता है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एडवोकेट गौरव पालीवाल ने कोर्ट को बताया कि राज्य आयुक्त, दिव्यांग जन ने पहले दायर शिकायत को खारिज कर दिया था और एम्स ऋषिकेश से पुनः सत्यापन की मांग को भी अनदेखा कर दिया गया था।
आगे क्या
कोर्ट ने मामले में जांच तेजी से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई 28 नवंबर को निर्धारित है, जिसमें शिक्षा विभाग को प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस रुख से दिव्यांग श्रेणी में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में मदद मिलेगी।




