
देहरादून: उत्तराखंड में नदियों के पुनर्जीवन को लेकर सरकार ने प्रयास तेज कर दिए हैं। एक जिला-एक नदी योजना के तहत देहरादून, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा जिलों की एक-एक नदी के पुनर्जीवन के लिए 40.50 करोड़ रुपये से अधिक की कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य वर्षाजल संरक्षण, भूमिगत जलस्तर में सुधार और नदियों के प्रवाह को बारहमासी बनाना है। राज्य सरकार का मानना है कि इन प्रयासों से पेयजल, सिंचाई और पर्यावरण संतुलन को मजबूती मिलेगी।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
प्रदेश में कई नदियां और जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है। इसी चुनौती को देखते हुए स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथारिटी (सारा) के माध्यम से नदियों और जलस्रोतों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एक जिला-एक नदी योजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
सचिवालय स्थित वीर चंद्र सिंह गढ़वाली सभागार में आयोजित सारा की राज्य स्तरीय कार्यकारी समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए जलागम सचिव दिलीप जावलकर ने निर्देश दिए कि जलस्रोत और नदी संरक्षण से जुड़ी सभी योजनाओं में प्रभाव आकलन और नियमित मॉनिटरिंग को अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने कहा कि वर्षा जल को रोककर भूमिगत करना और नदियों के प्रवाह को निरंतर बनाए रखना सारा का मुख्य उद्देश्य है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
जल संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि योजनाएं जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, तो इससे भविष्य में जल संकट से काफी हद तक राहत मिल सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक नौलों और धारों के पुनर्जीवन को लेकर भी लोगों में उम्मीद जगी है।
आंकड़े और तथ्य
बैठक में जानकारी दी गई कि चमोली जिले की चंद्रभागा नदी के पुनर्जीवन के लिए 1.66 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी जा चुकी है। वहीं ऊधम सिंह नगर और नैनीताल जिलों में भूजल रिचार्ज के लिए रिचार्ज शाफ्ट निर्माण को 40 प्रतिशत बजट जारी किया गया है। जलागम सचिव ने सौंग नदी की सहायक गडूल नदी की कार्ययोजना का भी संज्ञान लिया और बताया कि सौंग नदी देहरादून की लगभग 60 प्रतिशत जलापूर्ति करती है।
आगे क्या होगा
सरकार ने सभी संबंधित रेखीय विभागों को निर्देश दिए हैं कि वे आपसी समन्वय से कार्ययोजनाओं को अंतिम रूप दें और ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दें, जिनसे अधिकतम वर्षाजल संरक्षण संभव हो सके। इसके साथ ही पारंपरिक जलस्रोतों की पहचान कर उनके पुनर्जीवन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जाएगी।
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