
देहरादून: उत्तराखंड में भालू के हमलों की घटनाएं इस वर्ष चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई हैं। प्रदेश के 13 वन प्रभागों में भालू हमलों की पुष्टि हुई है, जिनमें 69 लोग घायल और 5 लोगों की मौत दर्ज की गई है। मामलों में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार ने वन विभाग को तत्काल और सख्त कदम उठाने के निर्देश जारी किए हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
पर्वतीय क्षेत्रों में मानव–वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। बदलते मौसम, जंगलों में भोजन की कमी और मानव बस्तियों के विस्तार के कारण वन्यजीव कई बार आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ जाते हैं। इस वर्ष भालुओं की गतिविधियाँ खासकर अधिक बढ़ी हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल है।
आधिकारिक जानकारी
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष राज्य में भालू के हमलों में 69 लोग घायल हुए हैं, जबकि 5 लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा पिछली चार साल की तुलना में सबसे अधिक है।
गढ़वाल मंडल के नौ वन प्रभागों में 63 घटनाएं, जबकि कुमाऊं मंडल में 11 घटनाओं की रिपोर्ट की गई है।
सबसे अधिक भालू हमले इन वन प्रभागों में दर्ज हुए:
रुद्रप्रयाग: 14
गढ़वाल: 13
बदरीनाथ: 12
सरकार ने इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग को त्वरित कार्रवाई के निर्देश जारी किए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वन विभाग से कहा है कि मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए कारगर कदम उठाए जाएं। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने अधिकारियों से चर्चा कर संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त और निगरानी बढ़ाने को कहा है।
प्रमुख सचिव वन आर.के. सुधांशु ने बताया कि भालू गतिविधि वाले हॉटस्पॉट चिह्नित किए जा रहे हैं। इसके लिए कैमरा ट्रैप, पगमार्क, और भालू की मूवमेंट पर आधारित डेटा जुटाया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में क्विक रिस्पांस टीम (QRT) की पैदल गश्त बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
स्थानीय प्रतिक्रिया
भालू हमलों के बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में भय का माहौल है। कई स्थानीय लोगों ने बताया कि शाम ढलते ही वे घरों से बाहर निकलने में डरते हैं। कुछ क्षेत्रों में भालू खेतों और घरों के आसपास भी देखे जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की टीम मौके पर आती है, लेकिन कुछ स्थानों पर गश्त को और अधिक बढ़ाने की जरूरत है।
आगे क्या
वन विभाग को निर्देश दिया गया है कि मानव–वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी एक्शन टेकन रिपोर्ट प्रतिदिन शासन को भेजी जाए। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान, ग्राम प्रधानों के साथ समन्वय और संवेदनशील स्थलों पर टीमों की तैनाती को और मजबूत किया जाएगा। विभाग का कहना है कि निरंतर निगरानी और वैज्ञानिक तरीके से हॉटस्पॉट की पहचान करने से घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।







