
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी वन प्रभाग से सात हजार से अधिक सीमा निर्धारण पिलरों के कथित रूप से गायब होने और इसमें वनाधिकारियों की संदिग्ध भूमिका को लेकर दायर जनहित याचिका पर गंभीर रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो, केंद्र सरकार और उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए अगली सुनवाई की तिथि तीन सप्ताह बाद तय की है। यह मामला राज्य में वन भूमि संरक्षण और अतिक्रमण से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
जनहित याचिका के अनुसार मसूरी वन प्रभाग की सीमाओं को चिन्हित करने के लिए वर्षों पहले हजारों पिलर लगाए गए थे। आरोप है कि इन पिलरों के गायब होने के बाद उन्हीं स्थानों पर अतिक्रमण हो गया, जिससे वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा। याचिकाकर्ता का दावा है कि शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
आधिकारिक जानकारी
मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई।
कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो, केंद्र सरकार और उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने को कहा है। अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी।
याचिका में लगाए गए आरोप
याचिकाकर्ता नरेश चौधरी ने आरोप लगाया कि मसूरी वन प्रभाग में लगाए गए लगभग 7375 पिलर गायब हो चुके हैं। उनका कहना है कि यह स्थिति वनाधिकारियों, राजनीतिक प्रभावशाली लोगों और भूमि माफियाओं के कथित गठजोड़ का परिणाम है। याचिका में यह भी कहा गया है कि वन विभाग की रिपोर्ट में अतिक्रमण की पुष्टि हुई है और अधिकांश पिलर मसूरी और रायपुर रेंज से गायब बताए गए हैं।
आंकड़े / तथ्य
रिपोर्ट के अनुसार भद्रीगाड़ से 62, जौनपुर से 944, देवलसारी से 296, कैंपटी से 218, मसूरी क्षेत्र से 4133 और रायपुर क्षेत्र से 1722 पिलर गायब पाए गए।
कुल मिलाकर 7375 पिलरों के लापता होने की बात सामने आई है।
विभागीय पक्ष
इस पूरे मामले पर मसूरी वन प्रभाग के तत्कालीन वन प्रभागीय अधिकारी अमित कंवर ने पहले सफाई देते हुए कहा था कि न तो पिलर गायब हैं और न ही कोई घोटाला हुआ है। उनके अनुसार इस संबंध में फैलाई जा रही जानकारी भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े संगठनों का कहना है कि यदि पिलरों के गायब होने की जांच निष्पक्ष तरीके से होती है, तो वन भूमि पर हुए अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। उनका मानना है कि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई ही भविष्य में जंगलों को बचा सकती है।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट के नोटिस के बाद अब सीबीआई, केंद्र सरकार और राज्य सरकार को अपना पक्ष रखना होगा। जवाब के आधार पर कोर्ट यह तय कर सकता है कि मामले में विस्तृत जांच किस एजेंसी से कराई जाए। अगली सुनवाई में इस प्रकरण की दिशा और स्पष्ट होने की उम्मीद है।







