
कोटद्वार: पौड़ी जिले के जयहरीखाल ब्लॉक में अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दुधारखाल में फार्मेसिस्ट पुनीता नेगी के 30 सितंबर को सेवानिवृत्त होने के बाद से अस्पताल पर ताला लटक गया है। 20 साल से अधिक समय तक अकेली फार्मेसिस्ट के रूप में सेवा देने वाली पुनीता की जगह कोई नई तैनाती नहीं हुई, जिससे 5,000 की आबादी वाले क्षेत्र के मरीजों को इलाज के लिए 20-30 किमी दूर सतपुली जाना पड़ रहा है। मई से एकमात्र चिकित्सक भी अनुपस्थित है, और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से ग्रामीणों में आक्रोश है।
स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली
- अस्पताल बंद: 1 अक्टूबर से स्वास्थ्य केंद्र पर ताला लटका है। मरीज रोज दवा की उम्मीद में आते हैं, लेकिन ताले देखकर लौट जाते।
- प्रभावित गांव: दुधारखाल, तोली, मलाणा, कांडई, टसीला, थल्दा, चौंडी, गवाणा, मल्ला घेरूवा, तल्ला घेरूवा, बसई आदि गांवों की 5,000 की आबादी इस केंद्र पर निर्भर थी।
- कर्मचारी संकट: इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड (IPHS) के अनुसार, केंद्र में एक चिकित्सा अधिकारी, दो फार्मेसिस्ट, दो स्टाफ नर्स, दो वार्ड बॉय, एक वार्ड आया, और दो सफाई कर्मियों के पद होने चाहिए, लेकिन केवल एक फार्मेसिस्ट थी।
- चिकित्सक की अनुपस्थिति: मई से एकमात्र चिकित्सक अनधिकृत रूप से अनुपस्थित है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. शिवमोहन शुक्ला ने बताया कि चेतावनी पत्र जारी किया गया है, और जल्द नई तैनाती होगी।
ग्रामीणों की मजबूरी
- मरीजों को इलाज के लिए सतपुली के राजकीय संयुक्त चिकित्सालय जाना पड़ रहा है, जो 20-30 किमी दूर है।
- सतपुली में भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं, और लोग हंस फाउंडेशन की चिकित्सा सुविधाओं पर निर्भर हैं।
- स्वास्थ्य केंद्र का आवासीय भवन झाड़ियों में घिरा है, जो व्यवस्था की उपेक्षा दर्शाता है।
पहले थी बेहतर व्यवस्था
- राज्य गठन से पहले: दुधारखाल स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर, फार्मेसिस्ट, और अन्य कर्मचारी मौजूद थे, और व्यवस्थाएं चाक-चौबंद थीं।
- राज्य गठन के बाद: कर्मचारियों की कमी और रखरखाव की उपेक्षा से हालात बिगड़े।
सामाजिक और स्वास्थ्य प्रभाव
- ग्रामीणों का आक्रोश: स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से लोगों में ठगा हुआ महसूस हो रहा है।
- स्वास्थ्य संकट: बिना डॉक्टर और फार्मेसिस्ट के ग्रामीणों को आपात स्थिति में तत्काल इलाज नहीं मिल रहा।
- प्रशासनिक जवाबदेही: CMO ने नई तैनाती का आश्वासन दिया, लेकिन समय रहते कार्रवाई न होने से विश्वास कमजोर हुआ।





