
देहरादून: भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) उत्तराखंड के किसानों और स्थानीय उत्पादकों के लिए नए अवसरों की उम्मीद जगा रहा है। अब तक यूरोप जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक राज्य के कृषि और पारंपरिक उत्पादों की पहुंच सीमित रही है, लेकिन एफटीए लागू होने के बाद यह स्थिति बदल सकती है। शुल्क में कमी और व्यापार प्रक्रियाओं के सरल होने से उत्तराखंड के उत्पाद यूरोपीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमत पर पहुंच सकेंगे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
उत्तराखंड के कई पारंपरिक और जैविक उत्पाद अभी तक ऊंचे आयात शुल्क और जटिल प्रमाणन प्रक्रियाओं के कारण सीमित दायरे में ही निर्यात हो पा रहे थे। एफटीए के बाद इन बाधाओं के कम होने की संभावना है। इससे राज्य के किसानों और उत्पादक समूहों को बेहतर दाम मिलने के साथ-साथ स्थायी बाजार मिलने की उम्मीद है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
उद्योग विभाग के सचिव विनय शंकर पांडेय ने कहा कि प्रदेश निर्यात के क्षेत्र में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और पहाड़ी राज्यों में उत्तराखंड पहले स्थान पर है। उनका कहना है कि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच व्यापार बढ़ने की स्थिति में इसका सीधा लाभ उत्तराखंड को मिलना तय है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
किसानों और स्वयं सहायता समूहों से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि यूरोप में नियमित बाजार मिलता है तो उनकी आय अधिक स्थिर हो सकेगी। स्थानीय उत्पादकों को उम्मीद है कि लंबे समय तक निर्यात ऑर्डर मिलने से पारंपरिक खेती और स्थानीय उत्पादन को नया जीवन मिलेगा।
आंकड़े और तथ्य
एफटीए का सीधा लाभ मंडुवा, झंगोरा, राजमा, चौलाई, शहद, मसाले, जड़ी-बूटी, आयुष और आर्गेनिक उत्पादों को मिलने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय यूनियन के 27 देशों में उत्तराखंड के उत्पादों को नियमित बाजार मिल सकता है, जिससे छोटे किसानों और किसान उत्पादक संगठनों को सबसे अधिक फायदा होगा।
आगे क्या होगा
एफटीए के लागू होने के बाद राज्य सरकार और संबंधित विभागों के सामने चुनौती होगी कि वे किसानों और कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करें। बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और गुणवत्ता नियंत्रण के जरिए उत्तराखंड के उत्पादों को यूरोप में मजबूती से स्थापित किया जा सकता है।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी पहलें
बीते वर्षों में राज्य सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आर्गेनिक खेती और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग पर काम किया है। एफटीए इन प्रयासों को और गति दे सकता है, जिससे हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र और स्थानीय कारीगरी को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने की संभावना है।







