
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर के कुलपति की नियुक्ति को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 मार्च 2026 की तिथि निर्धारित की है। यह मामला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शीर्ष पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया, पात्रता मानकों और मेरिट आधारित चयन व्यवस्था से जुड़े गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह जनहित याचिका प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में प्रोफेसर प्रकाश सिंह की नियुक्ति केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 और यूजीसी विनियम, 2018 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
याचिका के अनुसार, कुलपति पद के लिए विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में न्यूनतम 10 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है, जो संबंधित नियुक्ति में पूरा नहीं होता।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
मामले की सुनवाई के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट ने यूजीसी से स्पष्ट जवाब मांगा है कि नियुक्ति के दौरान पात्रता मानकों का पालन किया गया या नहीं। अदालत ने कहा कि जब तक यूजीसी का पक्ष सामने नहीं आता, तब तक मामले में कोई अंतिम टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
फिलहाल, विश्वविद्यालय या शिक्षा मंत्रालय की ओर से इस विषय पर कोई औपचारिक सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ शिक्षकों और कर्मचारियों का कहना है कि कुलपति जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति पूरी तरह नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे मामलों से संस्थान की शैक्षणिक साख और आंतरिक माहौल प्रभावित होता है।
आंकड़े और तथ्य
याचिका में विशेष रूप से यूजीसी विनियम, 2018 की विनियम 7.3 का उल्लेख किया गया है, जिसमें विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कम से कम 10 वर्षों के अनुभव को अनिवार्य बताया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में चेयर प्रोफेसर के रूप में कार्यकाल को विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह संस्था न तो विश्वविद्यालय है और न ही यूजीसी मानकों के तहत संचालित।
आगे क्या होगा
अब इस मामले में यूजीसी को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना है। इसके बाद अदालत द्वारा सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की जाएगी। 11 मार्च 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में मामले की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।
Rishikesh News आगे भी इस मामले की अपडेट देता रहेगा।
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