
देहरादून: आज के डिजिटल युग में गूगल मैप जैसे टूल्स सड़क मार्ग और स्थानिक जानकारी प्रदान करने के लिए सबसे लोकप्रिय हैं, लेकिन वैज्ञानिक अब भू-स्थानिक डेटा (जियोस्पेशल डेटा) पर विशेष जोर दे रहे हैं। खासकर उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए यह डेटा आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, और शहरी नियोजन में क्रांतिकारी साबित हो सकता है। मॉनसून सीजन में होने वाली आपदाओं के बीच भू-स्थानिक डेटा प्रभावित क्षेत्रों को मैप करने और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की वैज्ञानिक डॉ. एससी वैदेस्वरन ने ईटीवी भारत से विशेष बातचीत में बताया कि यह डेटा हिमालय क्षेत्र के लिए एक बुनियादी उपकरण बन गया है। आइए जानते हैं कि भू-स्थानिक डेटा उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के लिए कैसे फायदेमंद हो सकता है।
भू-स्थानिक डेटा: क्या है और क्यों जरूरी?
भू-स्थानिक डेटा, जिसे स्थानिक डेटा या स्थान-आधारित डेटा भी कहा जाता है, पृथ्वी की सतह और उसके विशिष्ट स्थानों को जोड़ता है। डॉ. एससी वैदेस्वरन ने कहा, “भू-स्थानिक डेटा वह है जिसका पृथ्वी पर कोई विशिष्ट लोकेशन होता है। जब इसे जीआईएस (भौगोलिक सूचना प्रणाली) में फिट किया जाता है, तो यह एक डिजिटल डेटा बन जाता है। यह डेटा हिमालयी क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां प्राकृतिक आपदाएं लगातार टोपोग्राफिक संरचना को बदल रही हैं।”
वाडिया इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में मॉनसून के दौरान भूस्खलन, बाढ़, और भू-धंसाव जैसी घटनाएं आम हैं। भू-स्थानिक डेटा के जरिए इन क्षेत्रों को मैप किया जा सकता है, जिससे प्रभावित इलाकों की पहचान और भविष्य की आपदाओं की भविष्यवाणी संभव हो जाती है। GIS, GPS, रिमोट सेंसिंग, और भू-स्थानिक विश्लेषण जैसी तकनीकें इस डेटा को निर्णय लेने का शक्तिशाली उपकरण बनाती हैं। डॉ. वैदेस्वरन ने जोर दिया, “पिछले वर्षों में एकत्रित भू-स्थानिक डेटा अब आपदा प्रबंधन के लिए उपयोगी साबित हो रहा है। बड़े शहरों का रोड नेटवर्क, बिल्डिंग्स, और यहां तक कि बिजली की हाई टेंशन वायरों का वजन भी मैप किया जा चुका है।”
आपदा प्रबंधन में भू-स्थानिक डेटा का योगदान
हिमालयी क्षेत्रों में मॉनसून के दौरान आपदा जैसी स्थिति बनना आम है। 2024 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में आपदाओं से 500 से अधिक मौतें और हजारों प्रभावित हुए। भू-स्थानिक डेटा इन घटनाओं को रोकने या कम करने में मदद कर सकता है। डॉ. वैदेस्वरन ने कहा, “पानी को चैनलाइज करने, कंट्रोल करने, और हिमालय को आपदा के लिए तैयार रखने के लिए भू-स्थानिक डेटा का सही उपयोग जरूरी है। यह डेटा प्रभावित क्षेत्रों को मैप करने और मॉनिटरिंग में सहायक होगा।”
उदाहरण के तौर पर, टोपोग्राफिक मैपिंग (भूमि की ऊंचाई और संरचना का मैप) से यह पता लगाया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा अधिक है। डॉ. वैदेस्वरन ने बताया, “राज्य का टोपोग्राफिक मैप बनाना बहुत जरूरी है, क्योंकि प्राकृतिक घटनाएं इसे लगातार बदल रही हैं। लॉडर मैपिंग के जरिए बेस मैप तैयार किया जा रहा है, जिससे बदलावों को ट्रैक किया जा सके।” यह तकनीक आपदा प्रतिक्रिया, रसद प्रबंधन, और पर्यावरण संरक्षण में क्रांति ला सकती है।
शहरी नियोजन और अन्य क्षेत्रों में लाभ
भू-स्थानिक डेटा केवल आपदाओं तक सीमित नहीं है। यह शहरी नियोजन, पर्यावरण प्रबंधन, और रसद जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क, बिल्डिंग्स, और बुनियादी ढांचे को मैप करने से विकास कार्य तेज होंगे। वाडिया इंस्टीट्यूट की एक हालिया स्टडी में पाया गया कि भू-स्थानिक डेटा से आपदा प्रभावित क्षेत्रों की 80% सटीक पहचान संभव है। डॉ. वैदेस्वरन ने कहा, “हिमालय के लिए बेस डेटा जनरेट करना जरूरी है। इससे भविष्य में टोपोग्राफिक बदलावों को आसानी से जाना जा सकेगा।”
उत्तराखंड सरकार ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। भू-स्थानिक डेटा पोर्टल के जरिए राज्य के हिमालयी क्षेत्रों को मैप करने का काम चल रहा है। इससे न केवल आपदा प्रबंधन मजबूत होगा, बल्कि पर्यटन और कृषि जैसे क्षेत्रों को भी लाभ मिलेगा।
हिमालय के लिए डिजिटल शील्ड
भू-स्थानिक डेटा उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक डिजिटल शील्ड की तरह काम कर सकता है। मॉनसून की आपदाओं से निपटने, टोपोग्राफिक मैपिंग, और निर्णय लेने में यह डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। डॉ. एससी वैदेस्वरन ने कहा, “यह डेटा हिमालय को प्रिपेयर और मॉनिटर करने का सशक्त माध्यम है। राज्य को इसे प्राथमिकता देनी चाहिए।” सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से उत्तराखंड आपदा-प्रवण क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। क्या यह तकनीक हिमालय को आपदाओं से बचा पाएगी?







