
देहरादून। कभी अपने शांत और सुकूनभरे माहौल के लिए पहचाने जाने वाला दून शहर अब जुलूसों, रैलियों और धार्मिक शोभायात्राओं का केंद्र बन गया है। सालभर होने वाले आयोजनों के कारण शहर का यातायात तंत्र चरमराया हुआ है। पांच से दस मिनट की दूरी तय करने में लोगों को एक से डेढ़ घंटे तक लग जाते हैं। आदेशों और योजनाओं के बावजूद राजधानी की सड़कों पर यातायात व्यवस्था ठप होती जा रही है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में शहर में रैलियों, विरोध प्रदर्शनों और धार्मिक जुलूसों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसका सीधा असर शहर के ट्रैफिक सिस्टम पर पड़ा है।
पिछले वर्ष कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक अभिनव कुमार ने आदेश जारी किया था कि राजकीय कार्य-दिवसों में किसी भी प्रकार के जुलूस या प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाएगी। लेकिन इन आदेशों का न तो पालन हुआ और न ही प्रभाव।
आंकड़े बताते हैं समस्या की गंभीरता
जनवरी से अक्टूबर 2025 तक दून की सड़कों पर कुल 126 बड़े आयोजन हुए — जिनमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और कर्मचारी संगठनों के प्रदर्शन शामिल रहे। अनुमान है कि यह संख्या दिसंबर तक 150 से अधिक पहुंच सकती है।
माहवार आयोजन विवरण:
| महीना | जुलूस / प्रदर्शन | धार्मिक / सामाजिक आयोजन | राजनीतिक प्रदर्शन |
|---|---|---|---|
| जनवरी | 13 | 06 | 05 |
| फरवरी | 10 | 05 | 06 |
| मार्च | 02 | 06 | 03 |
| अप्रैल | 02 | 05 | — |
| मई | 08 | 06 | 03 |
| जून | 04 | 03 | — |
| जुलाई | 03 | 03 | 02 |
| अगस्त | 04 | 05 | — |
| सितंबर | 02 | 08 | 03 |
| अक्टूबर | 02 | 03 | 04 |
ट्रैफिक दबाव का हाल
देहरादून की मुख्य सड़कों पर वाहनों का दबाव पहले से ही अत्यधिक है। जुलूस या शोभायात्रा के दौरान यह पूरी तरह ठप हो जाता है।
मुख्य मार्गों पर प्रति घंटे वाहनों की औसत संख्या:
- सहारनपुर रोड — 5000 से 5200
- गांधी रोड — 5200 से 5500
- राजपुर रोड — 5400 से 5600
- चकराता रोड — 4500 से 5000
- हरिद्वार रोड — 5000 से 5500
- हरिद्वार बाईपास रोड — 6000 से 6500
- अंदरूनी मार्ग — 4000 से 4500
इनमें से किसी एक सड़क पर जुलूस निकलते ही पूरा शहर प्रभावित होता है।
विशेषज्ञ और नागरिकों की राय
सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर के.जी. बहल का कहना है,
“किसी भी संगठन को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए सड़कों पर उतरकर लाखों नागरिकों को असुविधा पहुंचाना उचित नहीं है। विरोध संबंधित कार्यालयों के बाहर ही होना चाहिए।”
समाजसेवी सुशील त्यागी ने कहा कि,
“धार्मिक शोभायात्राएं भी संबंधित मंदिरों या संस्थानों के परिसर में सीमित की जा सकती हैं। धार्मिक भावना सड़कों पर नहीं, श्रद्धा स्थलों से जुड़ी होती है।”
यातायात योजनाओं की विफलता
पुलिस हर आयोजन के समय ट्रैफिक डायवर्जन प्लान बनाती है, लेकिन वाहन दबाव अधिक होने के कारण ये योजनाएं अमल में असफल रहती हैं। अधिकारियों के अनुसार, आयोजन की अनुमति देने से पहले मुख्य सड़कों के ट्रैफिक लोड और समय का विश्लेषण जरूरी है, ताकि जनता को न्यूनतम असुविधा हो।
आगे क्या किया जा सकता है
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि—
- शहर के बाहर या निर्धारित “प्रदर्शन स्थल” तय किए जाएं।
- धार्मिक आयोजनों के लिए परमिट प्रणाली सख्ती से लागू की जाए।
- व्यस्त मार्गों पर आयोजन की अनुमति देने से पहले विस्तृत ट्रैफिक ऑडिट हो।




