
पौड़ी। कोट विकासखंड के सितोनस्यूं पट्टी में स्थित फलस्वाड़ी गांव धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है। लोकमान्यता है कि यहीं माता सीता ने धरती में समाकर भू-समाधि ली थी। इसी पावन भूमि पर हर वर्ष इगास पर्व के दूसरे दिन पारंपरिक मानसार मेले का आयोजन किया जाता है। रविवार को हुए इस आयोजन में क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा और लोकगीतों के साथ शामिल हुए।
पृष्ठभूमि / धार्मिक महत्व
स्थानीय मान्यता के अनुसार, फलस्वाड़ी गांव वही पवित्र स्थल है जहां भगवान श्रीराम के वनवास के समय लक्ष्मण जी ने माता सीता को छोड़ा था। बाद में माता सीता ने यहीं धरती में समाकर भू-समाधि ली। इस कारण यह स्थल उत्तराखंड की “सीता तपोभूमि” और “उत्तराखंड की अयोध्या” के रूप में जाना जाता है। गांव के एक ओर महर्षि वाल्मीकि का मंदिर और दूसरी ओर लक्ष्मण मंदिर स्थित है, जो इस क्षेत्र को और भी पवित्र बनाता है।
मानसार मेले का आयोजन
हर वर्ष इगास पर्व के दूसरे दिन इस पावन भूमि पर मानसार मेले का आयोजन किया जाता है। रविवार को आयोजित मेले में आसपास के गांवों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे। देवल गांव स्थित लक्ष्मण मंदिर से श्रद्धालु ढोल-दमाऊं और धार्मिक ध्वज-निशानों के साथ शोभायात्रा के रूप में फलस्वाड़ी पहुंचे, जबकि कोटसाड़ा गांव से ग्रामीण रस्सी, दूण-कंडी और पारंपरिक सामग्रियों के साथ श्रद्धाभाव से आए।
फलस्वाड़ी पहुंचने के बाद निशान लगी लकड़ियों से खेत की प्रतीकात्मक खुदाई की गई। लोकविश्वास है कि इसी खुदाई के दौरान माता सीता के शिलारूप दर्शन होते हैं। जब श्रद्धालुओं ने दर्शन किए तो पूरा वातावरण ‘जय सीता माता’ के जयघोषों से गूंज उठा।
धार्मिक आस्था और लोकसंस्कृति का संगम
लक्ष्मण मंदिर समिति के अध्यक्ष प्रदीप भट्ट ने बताया कि,
“यह वही पवित्र भूमि है जहां माता सीता ने धरती में समाकर भू-समाधि ली थी। इस स्थल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अयोध्या से किसी भी तरह कम नहीं।”
पंडित अनसूया प्रसाद सुंदरियाल ने कहा कि सितोनस्यूं क्षेत्र प्राचीन मान्यताओं से परिपूर्ण है।
“यह भूमि हमारी संस्कृति, हमारी जड़ों और हमारे गौरव का प्रतीक है। जिस दिन लोग इसकी महत्ता को समझेंगे, वह दिन उत्तराखंड की आध्यात्मिक पहचान को नया आयाम देगा।”
सांस्कृतिक उत्सव और लोक परंपरा
मेले के दौरान ग्रामीणों ने पारंपरिक व्यंजन बनाए, लोकगीत गाए और ढोल-दमाऊं की ताल पर झूमकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की। पूरे क्षेत्र में एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्सव जैसा वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने कहा कि यदि इस स्थल को पर्यटन और तीर्थ सर्किट से जोड़ा जाए, तो यह उत्तराखंड की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में विकसित हो सकता है।
भविष्य की संभावनाएं
स्थानीय लोग अब इस तपोभूमि को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे न केवल आस्था को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और स्थानीय संस्कृति को भी नई पहचान मिलेगी।







