
तपोवन: ऋषिकेश के तपोवन क्षेत्र में विकास प्राधिकरण (टीडीए) की कार्यप्रणाली को लेकर स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश व्याप्त है। नागरिकों का आरोप है कि प्राधिकरण नियमों का पालन केवल चुनिंदा मामलों में कर रहा है, जबकि कई स्थानों पर अनधिकृत निर्माण और अवैध कब्जों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इस दोहरे मापदंड के कारण जनता में नाराजगी बढ़ती जा रही है, और लोग अब बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दे रहे हैं। यह विवाद न केवल प्राधिकरण की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, बल्कि उत्तराखंड में शहरी विकास और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी गंभीर बहस छेड़ रहा है।
चुनिंदा कार्रवाई का आरोप: प्रभावशाली लोगों को छूट
स्थानीय निवासियों का कहना है कि तपोवन विकास प्राधिकरण दोहरे मापदंड अपनाकर कार्य कर रहा है। कुछ सामान्य नागरिकों के निर्माण को अनधिकृत बताकर तुरंत सील कर दिया जाता है, जबकि प्रभावशाली व्यक्तियों के अवैध निर्माणों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हाल ही में, राम झूला के पास ओंकारानंद गंगा सदन के अनधिकृत निर्माण को सील करने की कार्रवाई ने इस विवाद को और हवा दी। एक स्थानीय निवासी, रमेश सिंह ने कहा, “प्राधिकरण कुछ लोगों पर तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन बड़े लोगों के अवैध निर्माण खुले में चल रहे हैं। यह भेदभाव अस्वीकार्य है।”
नागरिकों का कहना है कि तपोवन जैसे धार्मिक और पर्यटक स्थल पर अनधिकृत निर्माण और अवैध कब्जे पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति के लिए खतरा हैं। लेकिन प्राधिकरण की निष्क्रियता और चुनिंदा कार्रवाई से आम लोगों का भरोसा टूट रहा है। एक अन्य निवासी, अनीता रावत ने बताया, “हमारे पड़ोस में कई अवैध निर्माण चल रहे हैं, लेकिन प्राधिकरण की नजर सिर्फ छोटे लोगों पर पड़ती है। यह कहां का न्याय है?”
पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग
स्थानीय लोगों ने प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को अपारदर्शी और भेदभावपूर्ण बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने राज्य सरकार और जिलाधिकारी से अपील की है कि प्राधिकरण के कार्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो। एक सामाजिक कार्यकर्ता, दीपक जोशी ने कहा, “तपोवन विकास प्राधिकरण की मनमानी से आम लोग परेशान हैं। नियम सबके लिए एक समान होने चाहिए, चाहे वह कोई सामान्य नागरिक हो या प्रभावशाली व्यक्ति।”
लोगों ने यह भी मांग की कि प्राधिकरण को सभी अनधिकृत निर्माणों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए और उनकी स्थिति पर नियमित अपडेट देना चाहिए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि जनता का विश्वास भी प्राधिकरण पर बना रहेगा।
विरोध की चेतावनी: जनता का गुस्सा उबाल पर
नागरिकों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। स्थानीय व्यापारी संघ के अध्यक्ष, राकेश नेगी ने कहा, “हम शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन अगर प्राधिकरण ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं सुधारी, तो हम सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि तपोवन जैसे पर्यटक स्थल पर प्रशासनिक भेदभाव से पर्यटन उद्योग को भी नुकसान पहुंच सकता है।
तपोवन के एक अन्य निवासी, संजय रावत ने बताया, “हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह विकास निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। प्राधिकरण को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।” जनता अब एक ऐसी व्यवस्था की मांग कर रही है, जहां सभी के साथ समान व्यवहार हो और नियमों का पालन बिना भेदभाव के हो।
प्राधिकरण की चुप्पी: जवाब का इंतजार
तपोवन विकास प्राधिकरण ने अभी तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि प्राधिकरण कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव में कार्य कर रहा है, जिसके कारण चुनिंदा कार्रवाइयां हो रही हैं। स्थानीय लोग इस चुप्पी को प्राधिकरण की कमजोरी मान रहे हैं और इसे अपनी मांगों को और तेज करने का आधार बना रहे हैं।
निष्पक्षता और पारदर्शिता की जरूरत
तपोवन विकास प्राधिकरण के खिलाफ उठा यह विवाद उत्तराखंड में शहरी विकास और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए एक चेतावनी है। अनधिकृत निर्माणों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन यह कार्रवाई निष्पक्ष और समान होनी चाहिए। अगर प्राधिकरण अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करता, तो जनता का आक्रोश और बढ़ सकता है, जो न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि पूरे राज्य में विकास प्रक्रिया पर सवाल उठाएगा।
राज्य सरकार और जिलाधिकारी से अपेक्षा है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और तपोवन विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जांच कराएं। तपोवन जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटक स्थल की गरिमा और पर्यावरण को बचाने के लिए पारदर्शी और न्यायपूर्ण व्यवस्था अनिवार्य है।






