
देहरादून: प्रदेश की राजधानी देहरादून इन दिनों किसी शहर से अधिक एक चलता-फिरता जाम चैंबर बनती जा रही है। बाहर से आने वाले चमचमाते हाईवे, कटे पहाड़ और नए एक्सप्रेसवे यह आभास कराते हैं कि शहर आधुनिक यातायात की ओर बढ़ चुका है, लेकिन जैसे ही कोई शहर की सीमा में प्रवेश करता है, हकीकत सामने आ जाती है। यहां कदम रखते ही ऐसा लगता है मानो कोई अदृश्य दीवार खड़ी हो, जो कहती हो—अब आपका स्वागत जाम में है। सप्ताहांत हो या सामान्य कार्यदिवस, देहरादून की सड़कें हर दिन लोगों की धैर्य और समय की परीक्षा ले रही हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
देहरादून का यातायात दबाव अब किसी एक मौसम या खास दिन तक सीमित नहीं रह गया है। सुबह से रात तक सड़कों पर रेंगती गाड़ियां, लगातार बजते हॉर्न, सैलानियों की उलझन और स्थानीय लोगों की बेबसी शहर की पहचान बनती जा रही है। हालात यह हैं कि अब बातचीत की शुरुआत भी अक्सर इसी वाक्य से होती है—“जाम में फंसा हूँ, थोड़ी देर बाद बात करता हूँ।”
मुख्य सड़कों की जमीनी हकीकत
शहर की प्रमुख सड़कों पर जाम अब अपवाद नहीं, बल्कि रोज़ की दिनचर्या बन चुका है। राजपुर रोड, जिसे कभी शहर की सबसे वीआईपी सड़क माना जाता था, वहां सुबह दस बजे से रात नौ बजे तक हालात लगभग एक जैसे रहते हैं। ट्रैफिक सिग्नलों से पहले लंबी कतारें, दोनों ओर अतिक्रमण और सड़क किनारे खड़े वाहन इसकी सांसें घोंटते नजर आते हैं।
कौलागढ़–बल्लीवाला–आईएसबीटी कॉरिडोर अब ट्रैफिक का डरावना तिकोन बन चुका है। जीएमएस रोड पर जाम, बल्लूपुर चौक और कमला पैलेस तिराहे पर वाहन ऐसे फंसते हैं कि बिना यातायात पुलिस की मदद के निकलना मुश्किल हो जाता है। आईएसबीटी क्षेत्र में स्थिति और गंभीर हो जाती है, जहां अनियंत्रित ऑटो-विक्रम, ई-रिक्शा, अवैध पार्किंग और प्रतिबंध के बावजूद सड़क पर खड़ी बसें आम दृश्य बन चुकी हैं।
मसूरी मार्ग: जाम की सबसे बड़ी तस्वीर
मसूरी मार्ग देहरादून की ट्रैफिक पीड़ा का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। सप्ताहांत, छुट्टियों और पर्यटन सीजन में इस सड़क पर कई-कई किलोमीटर लंबा जाम लगना आम हो गया है। सामान्य दिनों में 40–50 मिनट का सफर जाम के दौरान तीन से चार घंटे में पूरा होता है। लाइब्रेरी चौक, हाथीपांव, भट्टाफाल, मैगी प्वाइंट और मसूरी डायवर्जन के पास वाहन इंच-इंच बढ़ते नजर आते हैं। किसी एक मोड़ पर वाहन खराब हो जाए तो पूरी सड़क ठप हो जाती है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि जाम अब केवल असुविधा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता पर सीधा असर डाल रहा है। लोगों का कहना है कि आज बच्चों को स्कूल छोड़ने में उतना समय लग जाता है, जितना कुछ साल पहले देहरादून से हरिद्वार पहुंचने में लगता था। दुकान खोलने से लेकर अस्पताल पहुंचने तक हर काम का पहला दुश्मन जाम बन चुका है। एक स्थानीय नागरिक के शब्दों में, “अब हमारी जिंदगी की रफ्तार नहीं, जाम तय करता है कि हम दिनभर क्या कर पाएंगे।”
सैलानियों की उलझन
दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, मेरठ, गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश-पंजाब के अन्य शहरों से आने वाले सैलानी अक्सर यही सवाल करते नजर आते हैं कि हाईवे पर तो सफर तेज रहा, लेकिन शहर में आते ही रास्ता कहां गया। मसूरी पहुंचने का उत्साह तब फीका पड़ जाता है, जब राजपुर रोड या जीएमएस रोड पर गाड़ियां टस से मस नहीं होतीं। धूप में तपते चेहरे और बढ़ता तनाव उनकी यात्रा का मजा किरकिरा कर देता है।
प्रशासनिक योजनाएं और जमीनी सच्चाई
मल्टीलेवल पार्किंग, स्मार्ट सिग्नलिंग, ऑटो-विक्रम और ई-रिक्शा रूट के पुनर्गठन जैसे दावे अक्सर सुनाई देते हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर बेहद सीमित दिखता है। दबाव वाले रूटों पर न तो प्रभावी ट्रैफिक मैनेजमेंट नजर आता है और न ही ठोस रोड इंजीनियरिंग समाधान।
आंकड़े और तथ्य
शहर हर साल लगभग 50 हजार नए वाहन जोड़ रहा है, लेकिन पार्किंग की व्यवस्था नाम मात्र की है। कई प्रमुख सड़कों का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा अतिक्रमण की चपेट में है। देहरादून आज भी 30 साल पुराने नक्शों पर चल रहा है, जबकि नई कॉलोनियां, अपार्टमेंट और आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। सार्वजनिक परिवहन की कमजोर रीढ़ के चलते लोग मजबूरी में निजी वाहनों की ओर बढ़ रहे हैं।
आगे क्या होगा
देहरादून आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां बाहर से आने वाला हर मेहमान कहता है कि राजधानी में चलना तक मुश्किल है, जबकि शहरवासी मानने लगे हैं कि जाम ही अब देहरादून की पहचान बन चुका है। यदि समय रहते ठोस ट्रैफिक प्लानिंग, अतिक्रमण हटाने और सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने पर काम नहीं हुआ, तो शहर की रफ्तार और धीमी होती चली जाएगी।
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