
धर्म डेस्क: Sankashti Chaturthi: 4 या 5 फरवरी कब है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी? जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त, फाल्गुन माह की द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी को लेकर इस बार श्रद्धालुओं के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कई लोग यह जानना चाहते हैं कि संकष्टी चतुर्थी 4 फरवरी को मनाई जाएगी या 5 फरवरी को। खासकर ऋषिकेश और आसपास के क्षेत्रों में गणेश भक्तों के लिए यह तिथि विशेष महत्व रखती है, क्योंकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत संकटों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चतुर्थी तिथि के चंद्र उदय के साथ जुड़ा होता है। इसी कारण कई बार तिथि दो दिनों में पड़ने पर भ्रम की स्थिति बन जाती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस वर्ष द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कब है, पूजा का सही समय क्या है और व्रत कैसे किया जाता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की सही तिथि कब है
पंचांग गणना के अनुसार फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि 4 फरवरी को देर रात शुरू होकर 5 फरवरी की रात तक रहेगी। लेकिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र उदय के आधार पर रखा जाता है। इस बार चंद्र उदय 5 फरवरी की रात को हो रहा है, इसलिए द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 5 फरवरी को मनाई जाएगी।
यह नियम शास्त्रों में स्पष्ट बताया गया है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत उसी दिन मान्य होता है जिस दिन चंद्र दर्शन के बाद पूजा संपन्न की जाए। इसलिए 4 फरवरी की बजाय 5 फरवरी को व्रत और पूजा करना शास्त्रसम्मत माना जाएगा।
4 या 5 फरवरी – भ्रम क्यों होता है
अक्सर तिथि की शुरुआत और समाप्ति सूर्यास्त या मध्यरात्रि से अलग-अलग समय पर होती है। चतुर्थी तिथि 4 फरवरी को शुरू हो रही है, इसलिए कई कैलेंडर में 4 फरवरी लिखा दिखता है। लेकिन संकष्टी चतुर्थी का मुख्य आधार चंद्र दर्शन है, जो 5 फरवरी को है। इसी कारण सही व्रत तिथि 5 फरवरी मानी जाएगी।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त
इस दिन भगवान गणेश की पूजा रात में चंद्र उदय के बाद की जाती है। स्थानीय पंचांग के अनुसार चंद्र उदय का समय लगभग रात 9:15 बजे के आसपास रहेगा। चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजा कर व्रत का पारण किया जाता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। दिनभर फलाहार या निर्जल व्रत रखने की परंपरा है। शाम के समय पूजा स्थान को शुद्ध कर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
रात में चंद्र उदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद भगवान गणेश को दूर्वा, मोदक, लाल फूल और धूप-दीप अर्पित करें। “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का जाप करें और द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में गणेश जी की आरती कर व्रत खोलें।
संकष्टी चतुर्थी व्रत से जुड़ी मुख्य जानकारी
| विषय | विवरण |
|---|---|
| व्रत की तिथि | 5 फरवरी |
| चंद्र उदय | रात लगभग 9:15 बजे |
| देवता | भगवान गणेश |
| व्रत का लाभ | संकटों से मुक्ति और सुख-समृद्धि |
| विशेष नाम | द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी |
ऋषिकेश में संकष्टी चतुर्थी का स्थानीय महत्व
ऋषिकेश में संकष्टी चतुर्थी पर कई श्रद्धालु गंगा स्नान कर व्रत की शुरुआत करते हैं। शाम को मंदिरों और घरों में गणेश पूजा होती है। स्थानीय पंडितों के अनुसार यहां चंद्र दर्शन के बाद पूजा करने की परंपरा विशेष रूप से मानी जाती है, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
Sankashti Chaturthi के इस पावन अवसर पर यह स्पष्ट है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 5 फरवरी को मनाई जाएगी, क्योंकि इसी दिन चंद्र उदय हो रहा है। सही तिथि और विधि से किया गया व्रत भगवान गणेश की विशेष कृपा दिलाता है और जीवन के संकटों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।







