
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए कहा है कि 1 जुलाई 2024 के बाद शुरू हुई सभी आपराधिक कार्यवाहियों में ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (बीएनएसएस) का पालन अनिवार्य है। इस संदर्भ में न्यायमूर्ति आलोक महरा की पीठ ने देहरादून की एक निचली अदालत में चल रही शिकायतों और जारी सम्मन आदेशों पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने निरस्त हो चुके पुराने कानून दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) के तहत कार्यवाही की, जो नए कानून के लागू होने के बाद कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
केंद्र सरकार द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) को 1 जुलाई 2024 से लागू किया गया है, जिसके साथ ही सीआरपीसी के कई प्रावधान समाप्त हो गए। नए कानून का उद्देश्य आपराधिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और आरोपी के अधिकारों के अनुरूप बनाना है। इसके बावजूद कुछ निचली अदालतों में पुराने प्रावधानों के तहत कार्यवाही के मामले सामने आए, जिन्हें लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी।
आधिकारिक जानकारी
यह मामला भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) अधिनियम, 2016 की धारा 17(1)(ए) और 29(3) के कथित उल्लंघन से जुड़ा है। देहरादून की कंपनी इंस्टकार्ट प्रा. लिमिटेड के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, देहरादून की अदालत में शिकायत दर्ज की गई थी। निचली अदालत ने 13 जून 2025 को संज्ञान लेते हुए आरोपियों के खिलाफ सम्मन और बाद में गैर-जमानती वारंट जारी किए। याचियों ने इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
स्थानीय प्रतिक्रिया
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश निचली अदालतों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश है। उनका मानना है कि नए कानून लागू होने के बाद पुराने प्रावधानों का उपयोग न केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि है, बल्कि इससे मुकदमों की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है।
कानूनी तर्क / विशेषज्ञ पक्ष
याचियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि यह मामला 1 जुलाई 2024 के बाद का है, इसलिए बीएनएसएस की धारा 223(1) के तहत मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य था। इसके विपरीत, निचली अदालत ने निरस्त हो चुके सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत सीधे संज्ञान लिया, जो कानूनन त्रुटिपूर्ण है।
आगे क्या होगा
न्यायमूर्ति आलोक महरा ने माना कि नया कानून लागू होने के बाद पुरानी प्रक्रिया अपनाना न्यायोचित नहीं है। अदालत ने कहा कि संज्ञान से पहले सुनवाई का अवसर न देना गंभीर प्रक्रियात्मक चूक है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने आगामी सुनवाई तक निचली अदालत के आदेशों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अब मामले में अगली सुनवाई के दौरान यह तय होगा कि निचली अदालत की कार्यवाही को किस प्रकार दुरुस्त किया जाए।





