
नैनीताल स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हत्या के प्रयास के एक मामले में निचली अदालत से आजीवन कारावास की सजा पाए व्यक्ति को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करार दिया है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा। इस फैसले से वर्ष 2015 के एक प्रकरण में काशीपुर निवासी जलालुद्दीन को बड़ी राहत मिली है, जिनकी उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए तत्काल रिहाई के आदेश दिए गए हैं, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
मामला 22 सितंबर 2015 की रात का है, जब काशीपुर शुगर मिल में ड्यूटी पर तैनात होमगार्डों ने कुछ संदिग्धों को देखने का दावा किया था। आरोप था कि रोकने पर जलालुद्दीन ने होमगार्ड विजय पाल सिंह पर देशी कट्टे से फायर किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इस आधार पर पुलिस ने धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज किया।
निचली अदालत का फैसला
प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, काशीपुर की अदालत ने 23 अक्टूबर 2019 को जलालुद्दीन को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
हाईकोर्ट की सुनवाई और टिप्पणियां
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने की। अदालत ने अभियोजन की कहानी में कई गंभीर विसंगतियां पाईं। जिस मुख्य गवाह खेमकरण के आधार पर आरोपी की पहचान का दावा किया गया था, उसने अदालत में अभियोजन का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा घटना के समय को लेकर गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास सामने आया।
जांच पर उठे सवाल
खंडपीठ ने पुलिस जांच प्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि घटनास्थल से न तो कोई कारतूस बरामद हुआ और न ही घायल के खून से सने कपड़े साक्ष्य के रूप में पेश किए गए। जिस हथियार की बरामदगी दिखाई गई थी, उस मामले में आरोपी पहले ही बरी हो चुका था। साथ ही एफआईआर दर्ज करने में लगभग 10 घंटे की देरी को भी अदालत ने संदिग्ध माना, जबकि पुलिस स्टेशन घटनास्थल से महज आधा किलोमीटर दूर था और सूचना रात में ही मिल गई थी।
संदेह का लाभ और अंतिम आदेश
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल घायल के बयान के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, खासकर जब वह एफआईआर और अन्य परिस्थितियों से मेल न खाता हो। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने जलालुद्दीन को सभी आरोपों से बरी करते हुए जेल प्रशासन को तत्काल रिहाई के आदेश दिए हैं, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
आगे क्या होगा
फैसले के बाद जेल प्रशासन को रिहाई की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अभियोजन पक्ष के पास आगे की कानूनी विकल्पों पर विचार करने का अधिकार रहेगा।







