
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पिरान कलियर कब्रिस्तान में महिला और उसके नाबालिग बेटे की हत्या के आठ साल पुराने मामले में निचली अदालत द्वारा चार आरोपियों को दी गई सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस रविंद्र मैठाणी और जस्टिस आलोक महरा की खंडपीठ ने पाया कि मामले की सुनवाई और निर्णय में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां रहीं। अदालत ने इस आधार पर पूरे प्रकरण को नए सिरे से निर्णय के लिए निचली अदालत को वापस भेज दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले से आपराधिक मामलों में निष्पक्ष सुनवाई और विधि प्रक्रिया के पालन को लेकर अहम संदेश गया है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
मामला 8 अगस्त 2009 का है, जब रुड़की के पिरान कलियर स्थित कब्रिस्तान में नूरजहां और उनके 10 वर्षीय बेटे अब्दुल रहमत के शव बरामद हुए थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतका का किराएदार इमाम रजा नकवी अपने साथियों के साथ मिलकर संपत्ति हड़पने के इरादे से इस दोहरे हत्याकांड में शामिल था। पुलिस ने इस प्रकरण में अलग-अलग समय पर चार चार्जशीट दाखिल की थीं, जिनके आधार पर चार अलग-अलग सत्र परीक्षण शुरू हुए थे।
आधिकारिक जानकारी
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने चारों अलग-अलग मामलों को एक साथ जोड़कर एक ही साझा फैसला सुना दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में “क्रिमिनल ट्रायल का कंसोलिडेशन” जैसा कोई प्रावधान नहीं है। केवल अभियुक्तों का संयुक्त परीक्षण संभव है, लेकिन अलग-अलग मुकदमों की गवाहियों को आपस में मिलाकर सजा देना विधिसम्मत नहीं है।
कानूनी खामी पर अदालत की टिप्पणी
अदालत ने यह भी माना कि अभियुक्त रफी और अजाम को उन प्रमुख गवाहों से जिरह करने का अवसर ही नहीं मिला, जिनके बयानों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन बताया और कहा कि किसी अभियुक्त को उन साक्ष्यों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जिन पर उसे सवाल उठाने का मौका नहीं मिला हो।
सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘एटी मायदीन बनाम सीमा शुल्क विभाग’ (2022) के निर्णय का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि भले ही साक्ष्य समान प्रतीत हों, लेकिन प्रत्येक मुकदमे में गवाहों के बयान और जिरह का प्रभाव अलग हो सकता है। इसलिए बिना विधिक प्रक्रिया के एक ट्रायल की गवाही को दूसरे ट्रायल में उपयोग नहीं किया जा सकता।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट ने संबंधित सत्र न्यायालय को निर्देश दिए हैं कि चारों मामलों के साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण किया जाए। निचली अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक अभियुक्त की भूमिका का निर्धारण केवल उसी ट्रायल में दर्ज साक्ष्यों के आधार पर हो, जिसमें उसे पूरा बचाव का अवसर मिला हो। नए सिरे से सुनवाई पूरी होने तक पुराना फैसला प्रभावी नहीं रहेगा।







