
उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में तैनात ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों (वीपीडीओ) के अंतरजनपदीय स्थानांतरण से जुड़े मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति की एकलपीठ ने विभाग द्वारा जारी तबादला रद्दीकरण आदेशों को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सचिव स्तर से जारी स्थानांतरण आदेशों को बाद में विभागीय अधिकारियों द्वारा निरस्त करना विधिसम्मत नहीं था। हालांकि, कोर्ट ने प्रशासनिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए सरकार को इस मामले में पुनर्विचार का अवसर भी दिया है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
मामले की शुरुआत नवंबर 2023 में हुई थी, जब तत्कालीन सचिव, पंचायती राज द्वारा कई वीपीडीओ के अनुरोध पर उन्हें एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरित किया गया। बाद में विभाग ने यह कहते हुए इन आदेशों को रद्द कर दिया कि वीपीडीओ जिला कैडर के पद हैं और अंतरजनपदीय तबादले नियमों के अनुरूप नहीं हैं। विभाग का यह भी तर्क था कि इन तबादलों से पहाड़ी जिलों में कर्मचारियों की कमी और मैदानी जिलों में अधिकता हो गई है।
आधिकारिक जानकारी
इस प्रकरण की सुनवाई उत्तराखंड हाईकोर्ट में वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ द्वारा की गई। कोर्ट ने निदेशक पंचायती राज द्वारा 3 जुलाई 2024 और सचिव पंचायती राज द्वारा 21 फरवरी 2025 को जारी किए गए स्थानांतरण रद्दीकरण आदेशों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि जब स्थानांतरण आदेश शासन के सचिव स्तर से जारी किए गए थे, तो अधीनस्थ अधिकारी उन्हें रद्द नहीं कर सकते थे। यह भी तर्क दिया गया कि यह कोई नियमित वार्षिक स्थानांतरण नहीं था, बल्कि विशेष परिस्थितियों में किया गया प्रशासनिक निर्णय था, जिस पर वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम लागू नहीं होता।
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उत्तराखंड लोक सेवकों के लिए वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम, 2017 इस मामले पर लागू नहीं होता, क्योंकि यह अधिनियम केवल नियमित वार्षिक तबादलों से संबंधित है। न्यायालय ने माना कि राज्य सरकार ने नियोक्ता के रूप में अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए ये स्थानांतरण किए थे।
राज्य सरकार की चिंताओं पर भी टिप्पणी
अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि बड़े पैमाने पर हुए इन तबादलों से पहाड़ी जिलों में कार्यबल की कमी और प्रशासनिक कठिनाइयां पैदा हुई हैं। कोर्ट ने माना कि वीपीडीओ जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले अधिकारी हैं और उनके कैडर में असंतुलन प्रशासनिक दक्षता को प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट ने रद्दीकरण आदेशों को खारिज करते हुए भी सरकार को पूरा अवसर दिया है। अदालत ने सचिव, पंचायती राज को निर्देश दिए हैं कि वह तीन महीने के भीतर इस पूरे मामले पर नए सिरे से विचार कर सकते हैं। हालांकि, ऐसा करने से पहले सभी संबंधित वीपीडीओ को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।







