
उत्तरकाशी जिले के गाजणा क्षेत्र में आयोजित गुरु चौरंगी नाथ मेला एक बार फिर अपनी अनूठी परंपराओं और आस्था के अद्भुत नजारों का केंद्र बना रहा। मेले के दौरान हलवा देवता के पश्वा पर देव अवतरण हुआ, जिन्होंने पारंपरिक रीति से सात किलो मंडुए का बाड़ी खाया। इस अनोखे दृश्य को देखकर ग्रामीण रोमांचित हो उठे।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
देवभूमि उत्तराखंड अपनी रहस्यमयी परंपराओं और देव संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहां आज भी कई ऐसे मेले और अनुष्ठान होते हैं जो सदियों पुरानी आस्थाओं को जीवित रखते हैं। गुरु चौरंगी नाथ मेला भी उन्हीं आयोजनों में से एक है, जो हर तीसरे वर्ष गाजणा क्षेत्र के विभिन्न गांवों में धूमधाम से संपन्न होता है।
मेले का आयोजन और अनूठी परंपरा
इस वर्ष भी चौंदियाट, दिखोली, सौड़, लोदाड़ा और भेटियारा गांवों की संयुक्त मेजबानी में गुरु चौरंगी देवता का पौराणिक मेला आयोजित किया गया। परंपरा के अनुसार हलवा देवता के पश्वा—जिन पर देवता अवतरित होते हैं—ने सात किलो मंडुए का बाड़ी (हलवे जैसा पारंपरिक भोजन) ग्रहण किया। यह दृश्य मेले का मुख्य आकर्षण रहा और भक्तों ने “हलवा देवता” के जयकारों के साथ आस्था व्यक्त की।
बाड़ी आम हलवे की तरह बनाई जाती है, लेकिन इसमें सूजी की जगह गेहूं या स्थानीय अनाज का आटा मिलाया जाता है। इसके बाद इसे देवता को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
देव डोलियों के साथ उमड़ी भीड़
मेले में क्षेत्र के प्रमुख आराध्य देव—
- भगवान तामेश्वर
- गुरु चौरंगी नाथ की डोली
- हलवा देवता की डोली
- हुणियां नागराजा की डोली
- हरि महाराज की डोली
- खंडद्वारी देवी की डोली
के साथ हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने भाग लिया। डोलियों के आगमन पर पारंपरिक नृत्य, ढोल-दमाऊ और लोक धुनें पूरे वातावरण को भक्तिमय बनाती रहीं।
स्थानीय प्रतिक्रिया
ग्रामीणों का कहना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
कई बुजुर्गों ने बताया कि “हर तीन साल बाद आयोजित होने वाला यह मेला गांवों को एक साथ जोड़ देता है और युवाओं को अपनी संस्कृति से परिचित कराता है।”
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झलक
भेटियारा गांव में बुधवार रात सांस्कृतिक संध्या का आयोजन हुआ, जिसमें प्रसिद्ध लोकगायक प्रीतम भरतवाण के जागर गीतों पर ग्रामीण देर रात तक झूमते रहे। देवताओं के आशीर्वाद के साथ गांवों की सुख-समृद्धि की कामनाएं की गईं।
पांच दिवसीय मेला
गुरु चौरंगी देवता का यह मेला कुल पांच दिनों तक चलता है—
- पहला दिन: चौंदियाट
- दूसरा दिन: दिखोली
- तीसरा दिन: सौड़
- चौथा दिन: लोदाड़ा
- पाँचवाँ दिन: भेटियारा (समापन)
अंतिम दिन डोलियां एकत्र होकर सामूहिक लोकनृत्य और पूजा के साथ मेला संपन्न होता है।
हजारों की भीड़ और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति
मेले में हजारों ग्रामीणों की भीड़ उमड़ी। समापन कार्यक्रम में गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान भी उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि “ऐसे पारंपरिक मेले पहाड़ की पहचान हैं और इनकी संरक्षण की जरूरत है।”
आगे क्या?
स्थानीय समितियों ने बताया कि आने वाले समय में मेले को और सुव्यवस्थित बनाने और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच देने की योजना बनाई जा रही है।







