
उत्तरकाशी जिले के सीमांत क्षेत्रों में परंपरागत देवलांग मेला इस वर्ष भी बड़ी धूमधाम से मनाया गया। बड़कोट, बनाल, ठकराल और धनारी पट्टियों के ग्रामीणों ने ढोल–नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए सांस्कृतिक रंग बिखेरे। पारंपरिक रीति से देवदार और चीड़ के वृक्षों की स्थापना और पूजा–अर्चना ने मेले को विशेष रूप से आकर्षक बनाया।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
देवलांग या दिलंक मेला उत्तरकाशी की पारंपरिक लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पर्व स्थानीय देवताओं को समर्पित होता है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखता है। इस मेले में विशेष रूप से देवदार और चीड़ के वृक्षों को स्थापित कर देव आशीर्वाद प्राप्त करने की मान्यता है।
अधिकारिक जानकारी
बड़कोट क्षेत्र के गैर, गंगटाड़ी और कुथनौर गांवों में बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र हुए और मेले के पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न किए। ठकराल पट्टी के लोग देवलांग जंगल से देवदार का वृक्ष काटकर क्षेत्र के आराध्य रघुनाथ देवता के प्रांगण में लाए। यहां ग्रामीणों ने लकड़ी के डंडों की सहायता से इसे खड़ा कर अग्नि प्रज्वलित की।
धनारी के पुजारगांव में आयोजित मेला भी आकर्षण का केंद्र रहा, जहां सिद्धेश्वर देवता मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई। मंदिर का नवनिर्माण किए जाने से इसकी भव्यता भी लोगों का ध्यान खींचती रही।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों ने बताया कि देवलांग मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति को एक साथ देखने और संजोने का अवसर भी है। कुछ ग्रामीणों का कहना था कि मेले में जुटी भीड़ और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बना दिया।
विशेष परंपराएं और आकर्षण
रात भर ढोल–नगाड़ों की थाप पर ग्रामीणों ने रासो और तांदी नृत्यों की प्रस्तुति दी। मेले में स्थानीय लोकगायक भी शामिल हुए, जिन्होंने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों से वातावरण को उल्लासपूर्ण बना दिया। मेले का मुख्य आकर्षण वह परंपरा रही जिसमें युवा जलती आग के बीच खड़े ऊंचे पेड़ पर चढ़कर रस्सी को छुड़ाते हैं। यह दृश्य रोमांच और साहस का प्रतीक माना जाता है। विशेष बात यह है कि इस पारंपरिक प्रदर्शन में आज तक किसी के घायल होने का रिकॉर्ड नहीं है।
रस्साकशी का मुकाबला
पुजारगांव धनारी में हुए रस्साकशी मुकाबले में पुजारगांव, दड़माली और गवाणा गांवों के ग्रामीण शामिल हुए। रस्सी टूटने के कारण प्रतियोगिता बराबरी पर समाप्त हुई। कार्यक्रम के बाद चीड़ के वृक्ष को मंदिर प्रांगण में खड़ा कर घास लगाई गई और परंपरा के अनुसार आग प्रज्वलित की गई।
व्यापारिक गतिविधियां और श्रद्धा
मेले में लगे स्टॉलों पर ग्रामीणों ने खरीदारी की। सिद्धेश्वर देवता के पुजारी ने पूजा–अर्चना कर सभी को आशीर्वाद दिया। मेले में इस वर्ष लोक संस्कृति की गहरी झलक देखने को मिली, जिसने स्थानीय लोगों के बीच आस्था और उत्साह को और मजबूत किया।
अगला कदम — क्या आगे होगा
स्थानीय समितियां आने वाले वर्ष के लिए आयोजन की तैयारियों को बेहतर बनाने पर विचार करेंगी। ग्रामीणों का कहना है कि मेले की प्रसिद्धि को देखते हुए भविष्य में इसके आयोजन को और सुव्यवस्थित किया जा सकता है।







