
देहरादून: उत्तराखंड में जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों में दहशत पैदा कर दी है। पौड़ी, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिसके मुद्दे ने अब संसद तक आवाज उठाई है। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार पर तंज कसते हुए इस स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
पिछले कुछ महीनों से राज्य के कई पहाड़ी जिलों में बाघ, गुलदार, भालू और जंगली सूअरों की सक्रियता में तेज़ी आई है। कई लोगों की मौत और गंभीर चोटों की घटनाओं ने वन विभाग के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। बार-बार जागरूकता अभियानों के बावजूद वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है।
सरकारी कदम
राज्य सरकार ने हाल ही में वन्य जीव संघर्ष से प्रभावित लोगों के लिए महत्वपूर्ण राहत उपायों की घोषणा की है।
इसके तहत:
• घायलों के इलाज का पूरा खर्च सरकार वहन करेगी।
• वन्य जीव हमले में मृत्यु होने पर परिजनों को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
सरकार ने वन विभाग और कृषि विभाग को निर्देशित किया है कि जिन क्षेत्रों में वन्यजीवों की गतिविधि अधिक है, वहां जाकर लोगों को जागरूक किया जाए और जरूरी सुरक्षा उपायों की जानकारी दी जाए।
मामला लोकसभा तक पहुंचा
राज्य में वन्य जीव संघर्ष का मुद्दा दिल्ली संसद में भी उठा। राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने वन्यजीव हमलों पर चिंता जताते हुए कहा कि उत्तराखंड के कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग जान गंवा रहे हैं और यह गंभीर मानवीय संकट का रूप ले रहा है। उन्होंने बताया कि बच्चों का स्कूल जाना, महिलाओं का जंगल जाना और ग्रामीणों का सामान्य जीवन जोखिम में है, इसलिए तत्काल और ठोस रणनीति की आवश्यकता है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस पूरे मुद्दे पर सरकार पर व्यंग्य करते हुए कहा कि “जबसे धामी जी धाकड़ हुए हैं, तब से न जाने कहां से इतने बाघ, गुलदार और भालू आ गए हैं। गांव-गांव में वन्य जीव लोगों को परेशान कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति चिंताजनक है और वन्य जीव संघर्ष अब गंभीर सामाजिक समस्या बनता जा रहा है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
ग्रामीणों का कहना है कि पिछले महीनों में जंगली जानवरों की संख्या अचानक बढ़ गई है, जिससे दिन और रात दोनों समय घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। कई गांवों में लोग बच्चों और बुजुर्गों को अकेला छोड़ने से डरते हैं। स्थानीय लोगों ने सरकार से गश्त बढ़ाने, पिंजरे लगाने और त्वरित कार्रवाई की मांग की है।
विशेषज्ञ टिप्पणी
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों के सिमटने, भोजन की कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण वन्य जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। इनका कहना है कि संघर्ष कम करने के लिए रिस्क मैपिंग, हॉटस्पॉट की पहचान और तेज फील्ड प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।
आगे क्या
सरकार ने आश्वासन दिया है कि वन्य जीव संघर्ष से निपटने के लिए नीतिगत स्तर पर नए कदम उठाए जाएंगे। वन विभाग लगातार प्रभावित क्षेत्रों में गश्त और निगरानी बढ़ा रहा है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे गंभीर प्रशासनिक चुनौती बताया है।






