
देहरादून में इस बार मौसम की बेरुखी ने सरकार से लेकर आम लोगों तक की चिंता बढ़ा दी है। सामान्य से बेहद कम वर्षा और बर्फबारी के चलते राज्य में आने वाले महीनों में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है। इसका असर खेती और बागवानी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जल विद्युत उत्पादन, जल संसाधनों और वन संपदा पर भी इसका सीधा प्रभाव दिखने लगा है। हालात ऐसे हैं कि सर्दियों के मौसम में ही जंगलों में आग की घटनाएं सामने आने लगी हैं और घटता बिजली उत्पादन आने वाली गर्मियों को लेकर नई चुनौतियों की ओर इशारा कर रहा है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड में आमतौर पर सर्दियों के दौरान अच्छी बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में हिमपात होता है, जो गर्मियों में नदियों के जलस्तर और बिजली उत्पादन के लिए अहम माना जाता है। लेकिन इस वर्ष दिसंबर और जनवरी में अपेक्षित वर्षा और बर्फबारी नहीं हो पाई, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।
नदियों का जलस्तर गिरा, बिजली उत्पादन पर असर
वर्षा और हिमपात न होने से राज्य की नदियों का जलस्तर तेजी से घटा है। उत्तराखंड की अधिकांश जल विद्युत परियोजनाएं नदी प्रवाह पर निर्भर हैं। आमतौर पर पहाड़ों पर पर्याप्त हिमपात होने से गर्मियों में ग्लेशियर पिघलते हैं और नदियों में पानी बढ़ता है, लेकिन इस बार ऐसी उम्मीद कमजोर दिखाई दे रही है। इससे ग्रीष्मकाल में बिजली उत्पादन पर संकट गहराने की आशंका जताई जा रही है।
आधिकारिक जानकारी
उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ. संदीप सिंघल के अनुसार, शीतकाल में विद्युत उत्पादन सामान्य रूप से न्यूनतम स्तर पर रहता है, लेकिन इस बार बर्फबारी न होने से गर्मियों की चिंता बढ़ गई है। वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 9 से 10 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन हो रहा है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में गर्मियों में यह बढ़कर करीब 20 मिलियन यूनिट तक पहुंच जाता है।
जंगलों में समय से पहले आग, वन विभाग सतर्क
मौसम की शुष्कता का सबसे गंभीर असर जंगलों में देखने को मिल रहा है। वर्षा न होने से वन क्षेत्रों में नमी बेहद कम हो गई है और पतझड़ के दौरान गिरी सूखी पत्तियों ने आग का खतरा बढ़ा दिया है। आमतौर पर 15 फरवरी के बाद फायर सीजन शुरू होता है, लेकिन इस बार दिसंबर और जनवरी में ही कई इलाकों में जंगल सुलगने लगे हैं। इससे वन विभाग की चिंता बढ़ गई है।
आंकड़े / तथ्य
इस शीतकाल में अब तक जंगलों में आग की 34 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें कुल 16.39 हेक्टेयर वन और अन्य भूमि क्षेत्र प्रभावित हुआ है। गढ़वाल क्षेत्र में 14 घटनाओं में करीब 4.4 हेक्टेयर वन क्षेत्र झुलसा है, जबकि कुमाऊं क्षेत्र में इस अवधि के दौरान आग की कोई घटना दर्ज नहीं की गई। वन्यजीव आरक्षित क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर रही, जहां 20 घटनाओं में 10.24 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट और 1.75 हेक्टेयर सिविल सोयम एवं वन पंचायत क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
वन विभाग की तैयारी
प्रमुख मुख्य वन्य संरक्षक आरके मिश्र ने बताया कि जंगलों में आग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए विभाग की ओर से ठोस कार्ययोजना बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि मौसम शुष्क बने रहने से चुनौतियां बढ़ गई हैं, इसलिए फायर सीजन शुरू होने से पहले ही विशेष रणनीति तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में भी बारिश और बर्फबारी नहीं हुई, तो राज्य को जल, बिजली और पर्यावरण के मोर्चे पर गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है। सरकार और विभागों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आने वाले महीनों में इन प्रभावों को संतुलित करना होगी।






