
27 जनवरी 2025 को उत्तराखंड ने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक निर्णायक कदम उठाया, जब राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू किया गया। संविधान के अनुच्छेद 44 में वर्णित निर्देशक सिद्धांत दशकों तक केवल वैचारिक बहस का विषय रहे, लेकिन उत्तराखंड ने उन्हें व्यावहारिक नीति में बदलकर एक नई राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया।
27 जनवरी 2026 को जब यूसीसी लागू होने का एक वर्ष पूरा हुआ, तो इसे केवल एक कानूनी उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक संरचना में हस्तक्षेप के रूप में देखा गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताया, लेकिन ज़मीनी अनुभव बताता है कि यह कानून जितना परिवर्तनकारी है, उतना ही जटिल भी।
कानूनी ढांचा: समानता का दावा, व्यवहार में बदलाव
यूसीसी का मूल तर्क स्पष्ट है—धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर सभी नागरिकों के लिए एक समान नियम। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में समान प्रक्रिया लागू कर राज्य ने यह संदेश दिया कि नागरिक पहचान, धार्मिक पहचान से ऊपर है।
महत्वपूर्ण यह है कि कानून ने पुत्रियों को संपत्ति में बराबरी, विवाह में न्यूनतम आयु की समानता और बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक के माध्यम से महिलाओं की कानूनी स्थिति को मजबूत किया। यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि उत्तराधिकार और वैवाहिक विवादों में दीर्घकालिक असर डालने वाला है।
हालांकि, पहले वर्ष का अनुभव यह भी बताता है कि कानून को अपनाने की गति समान नहीं रही। विवाह पंजीकरण में व्यापक स्वीकार्यता दिखी, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण को लेकर समाज में झिझक और असहजता बनी रही। यह अंतर दर्शाता है कि सामाजिक स्वीकृति, कानूनी आदेश से अधिक समय लेती है।
संशोधन 2026: राज्य का आत्ममंथन
यूसीसी (संशोधन) अध्यादेश 2026 को केवल तकनीकी बदलाव के रूप में देखना भूल होगी। यह दरअसल राज्य द्वारा पहले साल के अनुभवों से सीखा गया सबक है।
धोखाधड़ी, जबरदस्ती और पहचान छिपाने पर सख्त प्रावधान यह स्वीकार करते हैं कि कानून का दुरुपयोग भी संभव है। लिव-इन संबंध समाप्ति का प्रमाणपत्र और रजिस्ट्रार जनरल को बढ़े अधिकार प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि राज्य निजी जीवन में कितनी गहराई तक हस्तक्षेप कर सकता है।
‘विधवा’ शब्द को हटाकर ‘जीवित साथी’ जैसे शब्दों का प्रयोग यह संकेत देता है कि कानून केवल सख्ती नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और आधुनिक सामाजिक संरचनाओं को भी ध्यान में रख रहा है।
संवैधानिक टकराव: समानता बनाम स्वतंत्रता
यूसीसी की सबसे बड़ी चुनौती संवैधानिक संतुलन की है। एक ओर अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है, तो दूसरी ओर अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
जनजातीय समुदायों को मिली छूट और कुछ धार्मिक प्रथाओं पर प्रभाव को लेकर उठे सवाल बताते हैं कि “एकसमानता” अभी पूर्ण नहीं है। आलोचकों का तर्क है कि चयनात्मक छूट कानून की आत्मा को कमजोर करती है, जबकि समर्थक इसे संवेदनशील प्रशासनिक यथार्थ मानते हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण पर निजता के अधिकार की बहस यह दर्शाती है कि यूसीसी केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि राज्य और नागरिक के रिश्ते की पुनर्परिभाषा भी है।
राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भ
राजनीतिक दृष्टि से यूसीसी उत्तराखंड के लिए नीति प्रयोगशाला बन गया है। अन्य राज्य इसे मॉडल के रूप में देख रहे हैं, लेकिन बिना व्यापक संवाद इसे अपनाना जोखिम भरा हो सकता है।
राष्ट्रीय स्तर पर यदि समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ते हैं, तो उत्तराखंड का अनुभव यह सिखाता है कि कानून से पहले संवाद और सहमति आवश्यक है। बिना सामाजिक विश्वास के कोई भी सुधार लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होता।
संपादकीय निष्कर्ष: दिशा सही, गति संतुलित होनी चाहिए
उत्तराखंड का यूसीसी यह सिद्ध करता है कि कानूनी समानता व्यवहार में संभव है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सामाजिक बदलाव आदेश से नहीं, सहभागिता से आता है।
एक वर्ष में कानून ने महिलाओं के अधिकार मजबूत किए हैं और कई कुप्रथाओं पर अंकुश लगाया है। संशोधन इसे अधिक व्यावहारिक बनाते हैं, लेकिन भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य आलोचनाओं को कितना सुनता और समायोजित करता है।
यदि यह कानून संवाद, संवेदनशीलता और संवैधानिक संतुलन के साथ आगे बढ़ता है, तो उत्तराखंड सचमुच भारत को समानता की राह दिखा सकता है— विभाजन के नहीं, विश्वास के साथ।







