
देहरादून: उत्तराखंड में आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण की स्थिति को संतुलित और मापने योग्य बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य में सस्टेनेबल एनवायरमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स (एसईपीआई) तैयार कर लिया गया है, जिसके जरिए यह आकलन किया जाएगा कि इकोनॉमी ग्रोथ का पर्यावरण पर कितना और कैसा प्रभाव पड़ रहा है। आठ प्रमुख सेक्टरों और 86 इंडीकेटरों पर आधारित यह इंडेक्स नीति-निर्माताओं को यह समझने में मदद करेगा कि विकास की दौड़ में पर्यावरण कितना सुरक्षित है और कहां सुधार की जरूरत है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन लंबे समय से चुनौती रहा है। सड़क, पर्यटन, ऊर्जा और शहरीकरण के साथ पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा है। इन्हीं पहलुओं को वैज्ञानिक और आंकड़ों के आधार पर समझने के लिए एसईपीआई की अवधारणा पर काम शुरू किया गया था।
आधिकारिक जानकारी
नियोजन विभाग के सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एंड गुड गवर्नेंस सीपीपीजीजी द्वारा एसईपीआई को तैयार किया गया है। सीपीपीजीजी के निदेशक मनोज कुमार पंत ने बताया कि इंडेक्स में कृषि, वन, पर्यटन, पेयजल, ऊर्जा, मानव स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास–शहरी विकास और आपदा जैसे आठ सेक्टर शामिल किए गए हैं। इनके अंतर्गत कुल 86 इंडीकेटर रखे गए हैं, जिनके माध्यम से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया जाएगा।
बेस ईयर और तकनीकी प्रक्रिया
एसईपीआई के लिए बेस ईयर 2016–17 रखा गया है। इससे पहले 2018–19 में इको-सर्विसेज को लेकर पायलट अध्ययन किया गया था, जिसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल के माध्यम से तैयार किया गया था। अब इस मॉडल को और व्यापक बनाते हुए पूरे राज्य स्तर पर लागू किया गया है। भविष्य में इसे जिला स्तर तक ले जाने की योजना भी है।
इससे क्या बदलेगा
अधिकारियों के अनुसार, एसईपीआई से यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगा कि कहां फैक्ट्रियों का विस्तार हो रहा है, कितना जल दोहन हो रहा है और उसकी तुलना में भूजल रिचार्ज के लिए कितना काम किया गया है। यदि किसी क्षेत्र में संतुलन बिगड़ता है, तो संबंधित विभाग समय रहते सुधारात्मक कदम उठा सकेंगे।
प्लास्टिक, जल और हरियाली पर फोकस
एसईपीआई के जरिए यह भी आकलन किया जा सकेगा कि प्लास्टिक का उत्पादन और उपयोग कितना बढ़ रहा है और उसके मुकाबले प्रोसेसिंग व निस्तारण कितना हो रहा है। इसी तरह पौधारोपण, हरियाली और जैव विविधता से जुड़े संकेतकों के आधार पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में योजनाएं बनाई जा सकेंगी।
आगे की योजना
फिलहाल एसईपीआई को राज्य स्तर पर तैयार किया गया है और इसके अनुमोदन से जुड़ी प्रक्रिया चल रही है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में इसे जिला स्तर तक विस्तारित किया जाएगा, ताकि स्थानीय प्रशासन को भी अपने क्षेत्र में हो रहे पर्यावरणीय और आर्थिक बदलावों की स्पष्ट जानकारी मिल सके।





