
देहरादून: उत्तराखंड में सर्दी बढ़ने के साथ ही सड़क हादसों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। कोहरा, ठंड, फिसलन और खराब सड़क डिजाइन के साथ-साथ सुरक्षा इंतज़ामों की कमी इन दुर्घटनाओं के मुख्य कारण बनती जा रही है। पहाड़ी पगडंडियों से लेकर मैदानी इलाकों तक, हर दिन दुर्घटना के नए मामले सामने आ रहे हैं।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
राज्य में सड़क सुरक्षा को लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हाल के महीनों में हादसों की तेज रफ्तार ने चिंता और बढ़ा दी है। कई मार्गों पर सुरक्षा बैरियर टूटे पड़े हैं, कई जगह साइनबोर्ड गायब हैं और कई मोड़ों पर गहरी खाइयों के किनारे किसी भी प्रकार का सुरक्षा ढांचा मौजूद नहीं है। यात्रियों का कहना है कि विभागीय लापरवाही और अधूरी मरम्मत के कारण सफर हर दिन जोखिम भरा होता जा रहा है।
आधिकारिक जानकारी
सर्वेक्षण के अनुसार, देहरादून, टिहरी, चमोली और हरिद्वार जिलों में कुल 544 दुर्घटना-सम्भावित स्थल चिन्हित किए गए हैं। इन स्थानों पर टूटे क्रैश बैरियर, मिट चुकी सड़क मार्किंग, ब्लाइंड कर्व, गड्ढे और डिजाइन संबंधी गंभीर खामियाँ पाई गईं। इसके बावजूद अब तक सुधार कार्यों में अपेक्षित तेजी दिखाई नहीं दे रही।
लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता राजेश कुमार का कहना है कि सड़क सुरक्षा समिति की सिफारिशों के आधार पर इन स्थानों की मरम्मत और सुरक्षा उपायों पर काम किया जा रहा है। हालांकि, ज़मीनी हालात बताते हैं कि यह प्रक्रिया बेहद धीमी है और कई जगह काम शुरू भी नहीं हो पाया है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय निवासियों और यात्रियों का कहना है कि हादसों के बाद अधिकारी मौके पर जरूर आते हैं, लेकिन इसके बाद किसी कार्रवाई की जानकारी नहीं मिलती। लोगों ने सवाल उठाए कि 544 खतरनाक स्थलों में से वास्तव में कितने स्थानों पर सुधार हुआ और हादसों के बाद अधिकारियों की जवाबदेही कितनी तय हुई?
यात्रियों ने यह भी बताया कि सड़क सुरक्षा से जुड़े नोटिस, चेतावनियाँ और योजनाएँ अक्सर फाइलों तक ही सीमित रह जाती हैं, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी रहती है।
हालिया हादसे और बढ़ती चिंता
पिछले दिनों टिहरी में एक बस 70 मीटर गहरी खाई में गिर गई थी, जिसमें पांच लोगों की मौत हुई। हल्द्वानी में एक ही दिन में तीन सड़क दुर्घटनाओं में तीन लोगों की मृत्यु हुई। चमोली में बद्रीनाथ हाईवे पर बाइक-कार टक्कर में दो युवक जान गंवा बैठे। ऋषिकेश–चमोली मार्ग पर भी कई वाहन खाई में गिरने की घटनाएँ सामने आईं।
इन हादसों ने साबित कर दिया है कि सुरक्षा ढांचे की कमी और सड़कों की स्थिति यात्रियों के लिए बेहद खतरनाक बन चुकी है।
सड़क सुरक्षा की प्रमुख समस्याएँ
राज्य में सुरक्षा बैरियरों की भारी कमी, सड़क की नियमित मरम्मत और रखरखाव का अभाव, रात के समय अपर्याप्त लाइटिंग, संकरे मोड़ और ओवरस्पीडिंग जैसी चुनौतियाँ सड़क सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं।
आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में प्रति 100 दुर्घटनाओं पर औसतन 69.5 लोगों की मौत होती है, जबकि राष्ट्रीय औसत 36 है। पिछले एक दशक में राज्य में 21,625 मौतें सड़क हादसों में हुई हैं।
पहाड़ी जिलों में मैदानी इलाकों की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक मौतें दर्ज की जाती हैं। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि दुर्घटना संभावित स्थानों पर लगभग 40 प्रतिशत जगह साइनबोर्ड और बैरियर पूरी तरह गायब हैं।
आगे क्या?
राज्य सरकार और विभागों पर अब दबाव है कि सड़कों पर सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि दुर्घटना स्थलों की तुरंत मरम्मत, स्पष्ट संकेत चिह्न, सख्त गति नियंत्रण और सड़क डिजाइन सुधार जैसे कदम दुर्घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
लोगों की उम्मीद है कि सर्दियों के इस खतरनाक दौर में विभाग तेज़ी से काम करे, ताकि अनावश्यक जानमाल की क्षति को रोका जा सके।







