
देहरादून: उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष खतरनाक रूप लेता जा रहा है। राज्य में हर महीने औसतन आठ से अधिक तेंदुए के हमले दर्ज किए जाते हैं, जिनमें कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। पिछले 25 वर्षों में तेंदुए के हमलों की 2683 घटनाएँ दर्ज हुई हैं, जिनमें 547 लोगों की मौत और 2126 लोग घायल हुए। हाल के दिनों में पौड़ी और कुमाऊँ क्षेत्रों में लगातार हमलों ने जंगलों से सटे इलाकों में दहशत बढ़ा दी है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड एक पहाड़ी और जंगलों से घिरा हुआ राज्य है, जहाँ मानव और वन्यजीवों का संपर्क स्वाभाविक रूप से अधिक होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह संपर्क संघर्ष में बदलता जा रहा है। जनसंख्या बढ़ने, जंगलों के कटाव, और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ने से हमलों की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
पौड़ी जिले के गजल्ड गांव में हाल ही में तेंदुए के हमले में एक ग्रामीण की मौत ने स्थिति की गंभीरता को फिर उजागर कर दिया है।
आधिकारिक जानकारी
प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) रंजन मिश्रा ने बताया कि जिन क्षेत्रों में मानव–वन्यजीव संघर्ष के मामले सबसे अधिक आते हैं, वहाँ विशेष निगरानी और विशिष्ट योजनाओं के माध्यम से जोखिम कम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि विभाग जंगल से सटे गांवों में जागरूकता अभियान चलाता है और संवेदनशील इलाकों में गश्त बढ़ाई जाती है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संघर्ष की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं और वन विभाग इस चुनौती का समाधान खोजने के लिए विभिन्न रणनीतियों पर काम कर रहा है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
पहाड़ी जिलों के ग्रामीणों का कहना है कि शाम के बाद घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। लोगों ने तेंदुए और भालू के बढ़ते हमलों को लेकर चिंता जताई।
एक ग्रामीण ने कहा, “जंगल और गांव की दूरी कम हो रही है। हम हर दिन खतरे के बीच जीते हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं।”
कई लोगों ने मांग की कि सरकार को संघर्ष क्षेत्रों में स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
आंकड़े और तथ्य
• पिछले 25 वर्षों में तेंदुए के 2683 हमले दर्ज हुए।
• इनमें 2126 लोग घायल, जबकि 547 लोगों की मौत हुई।
• राज्य में औसतन हर महीने आठ तेंदुए हमले होते हैं।
• इस वर्ष अब तक 438 वन्यजीव हमले दर्ज हुए हैं।
• इनमें 44 लोगों की मौत और 394 लोग घायल हुए।
• हमलों में तेंदुए, बाघ, हाथी और सांप प्रमुख रूप से शामिल रहे।
ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि मानव–वन्यजीव संघर्ष प्रदेश में तेजी से बढ़ता खतरा बनता जा रहा है।
आगे क्या?
वन विभाग संवेदनशील क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप, गश्त बढ़ाने, और गांवों में रैपिड रेस्पांस टीम तैनात करने पर काम कर रहा है। विभाग यह भी देख रहा है कि किन इलाकों में परिवेशीय बदलाव या भोजन की कमी के कारण वन्यजीव बार–बार मानव बस्तियों में प्रवेश कर रहे हैं।
आने वाले समय में विशेषज्ञों की मदद से संघर्ष कम करने की नई रणनीतियाँ लागू की जा सकती हैं।






