
देहरादून — शिक्षा, रोजगार और तकनीक के विस्तार के साथ उत्तराखंड की नई पीढ़ी आज जिले और प्रदेश की सीमाओं से बाहर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना रही है। हालांकि इस वैश्विक जुड़ाव का असर क्षेत्रीय संस्कृति और बोली-भाषाओं पर भी दिखाई देने लगा है। युवा पीढ़ी का झुकाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय और विदेशी भाषाओं तक सीमित होता जा रहा है, जिससे गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी जैसी मातृभाषाओं से उनका रिश्ता कमजोर पड़ रहा है। यह स्थिति उत्तराखंड की समृद्ध भाषाई विरासत के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आ रही है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड भले ही भौगोलिक रूप से छोटा राज्य हो, लेकिन भाषाई विविधता के लिहाज से यह बेहद समृद्ध है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोलियां पीढ़ियों से सांस्कृतिक पहचान का आधार रही हैं। कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बोली का स्वरूप बदल जाना यहां की खास पहचान है। समय के साथ युवाओं का इन बोलियों से दूर होना इनके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहा है।
आधिकारिक जानकारी
स्थानीय बोली-भाषाओं के संरक्षण को लेकर केंद्र और राज्य स्तर पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उत्तराखंड के धारचूला क्षेत्र के रं समाज द्वारा अपनी बोली को बचाने के प्रयासों की सराहना कर चुके हैं। उन्होंने इसे देश के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बताया था।
स्थानीय प्रतिक्रिया
युवाओं का कहना है कि पढ़ाई और नौकरी के कारण वे अपनी मातृभाषा का प्रयोग कम कर पाते हैं। वहीं, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि तकनीक को माध्यम बनाया जाए तो युवा अपनी जड़ों से फिर जुड़ सकते हैं।
आंकड़े / तथ्य
उत्तराखंड में प्रमुख रूप से गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोलियों का प्रचलन है। राज्य के कई क्षेत्रों में बोलियों का स्वरूप कुछ किलोमीटर में बदल जाता है।
आगे क्या?
इन चुनौतियों को देखते हुए उत्तराखंड भाषा विभाग ने युवाओं को क्षेत्रीय बोलियों से जोड़ने के लिए एक विशेष मोबाइल एप शुरू किया है। इस एप के जरिए किसी भी भाषा में लिखे शब्द या वाक्य का गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी में अनुवाद किया जा सकेगा। विभाग का उद्देश्य है कि तकनीक के माध्यम से युवाओं के लिए इन भाषाओं को सरल, रोचक और सुलभ बनाया जाए।
भाषा विभाग के मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि युवाओं को अपने क्षेत्र, संस्कृति और भाषा से जोड़ना बेहद जरूरी है। इसके लिए सरकार, समाज और युवा—तीनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। उनका मानना है कि यह तकनीकी पहल युवाओं को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से फिर से जोड़ने में सहायक सिद्ध होगी।







