
नैनीताल: उत्तराखंड में राज्य सरकार के कर्मचारियों के निलंबन को लेकर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था स्पष्ट की है। नैनीताल हाईकोर्ट की एकलपीठ ने बीएलओ ड्यूटी में तैनात सिंचाई विभाग उत्तरकाशी के एक कनिष्ठ सहायक के निलंबन आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि यदि आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि लगाए गए आरोप ‘गंभीर’ श्रेणी के हैं और उनमें बड़ी सजा दी जा सकती है, तो ऐसा निलंबन कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना जाएगा। यह फैसला भविष्य में सरकारी कर्मचारियों के निलंबन मामलों पर सीधा असर डालने वाला माना जा रहा है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
मामला उत्तरकाशी जिले के पुरोला स्थित सिंचाई खंड से जुड़ा है। यहां एक कनिष्ठ सहायक को निकाय चुनाव के दौरान मतदाता सूची तैयार करने में कथित लापरवाही के आरोप में 5 दिसंबर 2025 को निलंबित किया गया था। कर्मचारी को बीएलओ ड्यूटी में तैनात किया गया था। निलंबन आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
आधिकारिक जानकारी
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने ‘उत्तराखंड सरकारी सेवक नियमावली 2003’ के नियम 4(1) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को निलंबित करते समय यह अनिवार्य है कि आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज हो कि आरोप इतने गंभीर हैं कि सिद्ध होने पर कर्मचारी को बड़ा दंड दिया जा सकता है। वर्तमान मामले में विभागीय आदेश में इस वैधानिक शर्त का उल्लेख नहीं किया गया था।
स्थानीय प्रतिक्रिया
सरकारी कर्मचारियों से जुड़े संगठनों का कहना है कि इस फैसले से कर्मचारियों को मनमाने निलंबन से राहत मिलेगी। उनका मानना है कि अब विभागों को निलंबन जैसे कदम उठाने से पहले नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।
आंकड़े / तथ्य
निलंबन आदेश 5 दिसंबर 2025 को जारी किया गया था। मामला बीएलओ ड्यूटी और मतदाता सूची से जुड़ा था। कोर्ट ने तकनीकी खामी के आधार पर आदेश को रद्द किया।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद संबंधित कर्मचारी को तत्काल राहत मिली है। साथ ही, भविष्य में राज्य सरकार के विभागों को निलंबन आदेश जारी करते समय नियमावली का सख्ती से पालन करना होगा। यह फैसला अन्य लंबित मामलों में भी मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है।





