
देहरादून: उत्तराखंड की पहाड़ियां अब सिर्फ सेब और मोटे अनाज तक सीमित नहीं रहीं। राज्य गठन के 25 वर्षों में यहाँ की मिट्टी और मेहनती किसानों ने खेती की नई परिभाषा गढ़ी है। आज कीवी, ड्रैगन फ्रूट, सगंध फसलों, फूलों, मशरूम और शहद उत्पादन से उत्तराखंड की खेती खुशहाली की नई खुशबू बिखेर रही है। सरकार की नीतियों और किसानों की नवाचार सोच ने पहाड़ की कृषि को आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर किया है।
बदलती खेती, बढ़ता आत्मनिर्भरता का विश्वास
उत्तराखंड में वर्तमान में 2.97 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल बागवानी फसलों के अधीन है। इनमें 5 लाख से अधिक किसान प्रत्यक्ष रूप से जुड़कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। राज्य गठन से पहले जहाँ खेती मुख्यतः मंडुवा, झंगोरा जैसे मोटे अनाजों पर आधारित थी, वहीं अब नकदी फसलों और बागवानी उत्पादों ने इसकी दिशा बदल दी है।
कीवी और ड्रैगन फ्रूट्स की खेती में नई उड़ान
राज्य सरकार ने कीवी और ड्रैगन फ्रूट उत्पादन नीति लागू कर इन फसलों को बढ़ावा दिया है। बागेश्वर जिले के कपकोट और कांडा क्षेत्र में किसान कीवी उत्पादन में आगे आए हैं। वर्तमान में राज्य में 682 हेक्टेयर में 381 मीट्रिक टन कीवी उत्पादन हो रहा है। सरकार कीवी खेती पर 80 प्रतिशत सब्सिडी दे रही है, जिससे युवाओं और महिला समूहों में उत्साह है।
फूलों से महकते पहाड़ — 25 साल में 11 गुना वृद्धि
राज्य गठन के समय जहाँ केवल 150 हेक्टेयर क्षेत्र में फूलों की खेती होती थी, आज यह बढ़कर 1650 हेक्टेयर हो चुकी है। फूलों के उत्पादन में जरबेरा, कारनेशन, ग्लेडियोलाई, गुलाब, लिलियम और रजनीगंधा प्रमुख हैं। फ्लोरीकल्चर ने उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार का नया माध्यम प्रदान किया है।
बिना जमीन के भी खेती — मशरूम बना नई उम्मीद
उत्तराखंड में अब मशरूम उत्पादन रोजगार और आय का सशक्त साधन बन गया है। राज्य में वर्तमान में 380 मशरूम उत्पादन इकाइयाँ स्थापित हैं, जिनसे हर वर्ष 2,000 मीट्रिक टन से अधिक मशरूम उत्पादन हो रहा है। कम स्थान और कम लागत में अधिक मुनाफा मिलने से यह किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
बुरांश और माल्टा जूस ने खोला बाज़ार का दरवाज़ा
बुरांश, जो उत्तराखंड का राज्य पुष्प है, अब स्वरोजगार का प्रतीक बन चुका है। पहले इसे केवल चटनी या स्थानीय औषधि के रूप में उपयोग किया जाता था, लेकिन अब बुरांश जूस देशभर में लोकप्रिय है। स्वयं सहायता समूहों द्वारा इसका वाणिज्यिक उत्पादन और विपणन किया जा रहा है। साथ ही माल्टा जूस की मांग भी तेजी से बढ़ी है, जो अब राज्य के हिल प्रोडक्ट्स की शान बन चुका है।
हाउस ऑफ हिमालयाज: स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय पहचान
राज्य सरकार ने स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंग और पैकेजिंग के लिए ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ ब्रांड लॉन्च किया है। इसके तहत 35 स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा गया है। यह पहल किसानों और कारीगरों को एक बड़ा ब्रांड वैल्यू और मार्केट एक्सपोज़र प्रदान कर रही है।
सेब उत्पादन में नई पहचान
पहले उत्तराखंड में सेब उत्पादन सीमित क्षेत्रों तक था, लेकिन अब चंपावत, बागेश्वर और उत्तरकाशी में उच्च गुणवत्ता के सेब उत्पादन से राज्य ने अपनी अलग पहचान बनाई है। अब उत्तराखंड का सेब भी हिमाचल और कश्मीर की तरह राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी स्थान बना रहा है।
सुगंधित फसलों (एरोमा) का 100 करोड़ का कारोबार
उत्तराखंड में सगंध फसलों की खेती अब एक 100 करोड़ रुपये के उद्योग में तब्दील हो चुकी है। राज्य के 22,000 से अधिक किसान अब डेमस्क गुलाब, मिंट, तेजपात, लेमनग्रास, जिरेनियम, कालाजीरा और रोजमेरी जैसी फसलों की खेती कर रहे हैं। इनसे एरोमा ऑयल और औषधीय उत्पादों का उत्पादन किया जा रहा है, जिसकी देश-विदेश में बड़ी मांग है।
मुख्य फसलों का आँकड़ा (2024-25)
| फसल | क्षेत्रफल (हेक्टेयर) | उत्पादन (मीट्रिक टन) |
|---|---|---|
| फल | 79,695 | 3,60,014 |
| सब्जी | 57,716 | 4,77,456 |
| मसाला | 17,866 | 94,810 |
| पुष्प | 644 | 2,600 |
| मशरूम | 380 | 2,000 |
| एरोमा फसलें | 7,652 | 17,078 |
आगे की दिशा
राज्य सरकार का लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में बागवानी क्षेत्र को 4 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का है। इसके साथ ही क्लाइमेट-फ्रेंडली कृषि तकनीक, कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क और एग्री-टूरिज्म को भी बढ़ावा देने की योजना है। उत्तराखंड की खेती अब “आत्मनिर्भर भारत के पर्वतीय मॉडल” के रूप में देश के सामने उदाहरण बन रही है।





