
नैनीताल: उत्तराखंड में यूकेएसएसएससी स्नातक स्तरीय परीक्षा पेपर लीक मामले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में गिरफ्तार मुख्य आरोपी हाकम सिंह रावत की जमानत अर्जी पर सुनवाई की। न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की एकलपीठ ने राज्य सरकार को इस मामले में जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अगली सुनवाई के लिए 10 नवंबर 2025 की तारीख तय की गई है। इस मामले ने न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि बेरोजगार युवाओं के बीच गहरे आक्रोश को भी जन्म दिया है, जिसके चलते परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी।
हाकम सिंह की याचिका: “झूठा फंसाया गया”
हाकम सिंह की ओर से दायर जमानत याचिका में दावा किया गया कि उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उनके वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि हाकम के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं और उनकी गिरफ्तारी गलत आधार पर की गई। हालांकि, सरकारी पक्ष ने इस याचिका पर आपत्ति दर्ज करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया। न्यायमूर्ति आलोक वर्मा ने सरकार को निर्देश दिया कि वह विस्तृत जवाब और आपत्तियां समय पर दाखिल करे। इस सुनवाई ने एक बार फिर यूकेएसएसएससी पेपर लीक कांड को चर्चा में ला दिया है, जो उत्तराखंड में बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रिया की खामियों को उजागर करता है।
पेपर लीक का घटनाक्रम: नकल गिरोह का पर्दाफाश
यूकेएसएसएससी स्नातक स्तरीय परीक्षा से ठीक एक दिन पहले उत्तराखंड एसटीएफ और देहरादून पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर नकल गिरोह के सरगना हाकम सिंह रावत और उनके एक सहयोगी को गिरफ्तार किया था। आईजी नीलेश आनंद भरणे ने तब खुलासा किया था कि हाकम सिंह ने 6 अभ्यर्थियों से 15-15 लाख रुपये लेकर परीक्षा में नकल कराने की साजिश रची थी। एसटीएफ ने सूचना के आधार पर जाल बिछाया और हाकम को उसके सहयोगी के साथ दबोच लिया।
गिरफ्तारी के बाद प्रशासन और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) को भरोसा था कि परीक्षा शांतिपूर्ण और पारदर्शी होगी। लेकिन 21 सितंबर 2025 को परीक्षा समाप्त होने से कुछ ही देर पहले सोशल मीडिया पर प्रश्न पत्र के कुछ सवाल वायरल हो गए। इससे पूरे राज्य में हड़कंप मच गया। विपक्षी दलों और बेरोजगार युवाओं ने इस घटना को लेकर तीखा विरोध जताया, जिसके बाद सड़कों पर आंदोलन शुरू हो गया।
युवाओं का आंदोलन: परीक्षा रद्द, सीएम ने दिए जांच के आदेश
पेपर लीक की खबर ने बेरोजगार युवाओं के बीच आक्रोश फैला दिया। नैनीताल, देहरादून, और हल्द्वानी में सड़कों पर उतरे युवाओं ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की। आंदोलन इतना उग्र हो गया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। सीएम ने पेपर लीक की उच्चस्तरीय जांच की संस्तुति की और यूकेएसएसएससी स्नातक स्तरीय परीक्षा को रद्द करने का आदेश दिया।
एक बेरोजगार युवा, राकेश जोशी ने कहा, “हम सालों से मेहनत कर रहे हैं, लेकिन पेपर लीक जैसे कांड हमारा भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। सरकार को ऐसी घटनाओं पर सख्ती बरतनी चाहिए।” इस घटना ने उत्तराखंड में भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
पेपर लीक के बाद उत्तराखंड एसटीएफ ने कई अन्य संदिग्धों को हिरासत में लिया और मामले की गहराई से जांच शुरू की। आईजी नीलेश आनंद भरणे ने बताया, “हम इस गिरोह के तार कहां-कहां जुड़े हैं, इसकी पूरी जांच कर रहे हैं। कोई भी दोषी बख्शा नहीं जाएगा।” पुलिस ने सोशल मीडिया पर वायरल हुए प्रश्न पत्रों की प्रामाणिकता की जांच शुरू की और पाया कि यह लीक सुनियोजित था।
विपक्षी दलों ने इस मामले को भाजपा सरकार की नाकामी करार दिया। कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कहा, “पेपर लीक उत्तराखंड के युवाओं के साथ धोखा है। सरकार भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में विफल रही है।” इस बीच, सीएम धामी ने आश्वासन दिया कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे।
भर्ती प्रक्रिया पर सवाल, प्रेस फ्रीडम का मुद्दा
यूकेएसएसएससी पेपर लीक कांड ने उत्तराखंड में भर्ती प्रक्रियाओं की खामियों को उजागर किया है। हाकम सिंह की जमानत अर्जी पर सुनवाई और सरकार की जवाबदेही इस मामले को और गंभीर बनाती है। यह घटना न केवल बेरोजगार युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठाती है।
न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की पीठ के फैसले से यह स्पष्ट है कि कोर्ट इस मामले को गंभीरता से ले रहा है। 10 नवंबर की सुनवाई में सरकार का जवाब इस मामले की दिशा तय करेगा। बेरोजगार युवाओं और विपक्ष की नजर अब इस सुनवाई पर टिकी है। क्या उत्तराखंड सरकार इस कांड के दोषियों को सजा दिला पाएगी और भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बना पाएगी? यह समय बताएगा।







