
रुद्रपुर: उत्तराखंड का अन्न भंडार कहे जाने वाले उधम सिंह नगर जिले में प्रशासन ने बेमौसमी यानी ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर पूरी तरह रोक लगा दी है। यह फैसला भूजल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, लेकिन इसके चलते जिले के हजारों किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। प्रशासन के अनुसार अब किसान केवल एक फरवरी से 30 अप्रैल के बीच ही धान की खेती कर सकेंगे। इस निर्णय से करीब 15 हजार से अधिक किसान सीधे तौर पर प्रभावित होंगे, जो पिछले कुछ वर्षों से गर्मियों में भी धान की खेती कर रहे थे।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उधम सिंह नगर जिले को उत्तराखंड का “फूड बाउल” कहा जाता है। यहां रबी और खरीफ के साथ-साथ पिछले कुछ वर्षों से ग्रीष्मकालीन धान की खेती भी बड़े पैमाने पर होने लगी थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में लगभग 20 से 22 हजार हेक्टेयर भूमि पर बेमौसमी धान की खेती की जा रही थी। धान ऐसी फसल है, जिसमें अत्यधिक पानी की जरूरत होती है और गर्मियों में इसकी सिंचाई के लिए लगातार नलकूपों का इस्तेमाल किया गया, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया।
आधिकारिक जानकारी
कृषि विभाग के कृषि रक्षा अधिकारी डॉ. नवीन जोशी ने बताया कि बेमौसमी धान की खेती से न केवल भूजल स्तर गिरा है, बल्कि इसके बाद होने वाली धान की फसल में रोगों का प्रकोप भी बढ़ा है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बार जिले में बेमौसमी धान की खेती पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है। यदि कोई किसान इस आदेश का उल्लंघन करता पाया गया, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
वैकल्पिक फसलों का सुझाव
प्रशासन ने किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करने की सलाह दी है। इसके तहत मक्का, गन्ना और मिंट (पुदीना) की खेती को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। कृषि विभाग किसानों को जागरूक कर रहा है ताकि उनकी आमदनी पर ज्यादा असर न पड़े।
डॉ. नवीन जोशी के अनुसार फरवरी माह से किसानों को हाइब्रिड मक्का के बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। पिछले वर्ष जिले में लगभग छह हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का की खेती हुई थी, जबकि इस बार नौ हजार हेक्टेयर में मक्का की खेती का लक्ष्य रखा गया है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
किसानों का कहना है कि बेमौसमी धान पर रोक से उनकी चिंता बढ़ गई है। किसान नेता तेजेंदर सिंह वृक ने बताया कि भूजल का गिरता स्तर जरूर चिंता का विषय है, लेकिन किसानों को वैकल्पिक फसलों का उचित दाम न मिलना भी उतनी ही बड़ी समस्या है। उनका कहना है कि मक्का या दलहन की खेती करने पर या तो गुणवत्तापूर्ण बीज नहीं मिलते या फिर फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, जिससे किसान की लागत भी नहीं निकलती।
आंकड़े / विवरण
जिले में 20–22 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बेमौसमी धान की खेती होती थी। इससे जुड़े 15 हजार से अधिक किसान अब सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। प्रशासन का दावा है कि इस निर्णय से भूजल संरक्षण में मदद मिलेगी, लेकिन किसानों की आय पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
आगे क्या होगा
प्रशासन का कहना है कि आने वाले समय में किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए तकनीकी सहायता और बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। वहीं किसान संगठनों की मांग है कि यदि धान पर रोक लगाई जा रही है, तो सरकार को वैकल्पिक फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि किसानों को नुकसान न उठाना पड़े।







