
ऋषिकेश: तीर्थनगरी ऋषिकेश में होली पर्व से पूर्व होलिका पूजन श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहर के प्रमुख चौक-चौराहों तक पूजा-अर्चना का आयोजन हुआ, लेकिन विशेष रूप से त्रिवेणी घाट परिसर में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या देखी गई। दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा और लोग पारंपरिक विधि-विधान से होलिका पूजन में शामिल हुए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन होलिका पूजन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश स्मरण किया जाता है।
श्रद्धालु प्रातःकाल से ही गाय के गोबर के उपले, अनाज, नमक, पीली सरसों, कपूर, हरी इलायची, लौंग और गुड़ अर्पित कर विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। उपलों की माला बनाकर होलिका की पूजा करने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे होलिका के अंग के रूप में मान्यता प्राप्त है।
धार्मिक महत्व और समय
पंडित आदित्य शर्मा ने बताया कि होलिका दहन का विशेष धार्मिक महत्व है। उनके अनुसार इस वर्ष रात्रि 1:30 बजे होलिका दहन किया गया। दहन से पूर्व रात्रि 1:23 बजे प्रह्लाद स्वरूप ध्वज को होलिका से उतारा गया, जिसके बाद विधिवत दहन संपन्न हुआ।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलिका की अग्नि में नई फसल की बालियां अर्पित करने से घर में अन्न-धन की कमी नहीं रहती और सुख-समृद्धि बनी रहती है। होलिका की राख को शुभ और रोगनाशक भी माना जाता है, जिससे श्रद्धालु तिलक लगाते हैं।
विशेष आयोजन
होलिका दहन के अवसर पर त्रिवेणी घाट में विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। युवाओं के लिए गुलाल की होली और महिलाओं के लिए लड्डू की होली की व्यवस्था की गई, जिससे उत्सव का माहौल और भी उल्लासपूर्ण हो उठा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ऋषिकेश में होलिका पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। कई परिवार हर वर्ष एक साथ पूजा में शामिल होकर परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं।
आगे क्या होगा
होलिका दहन के बाद अगले दिन रंगों की होली पूरे शहर में मनाई जाएगी। प्रशासन की ओर से प्रमुख स्थलों पर सुरक्षा और व्यवस्था के इंतजाम किए गए हैं ताकि पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
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