
चमोली: विकासखंड पोखरी के अंतर्गत अलकनंदा घाटी के रानों गांव में गांव के आराध्य रावल देवता के आगमन के साथ पौराणिक पांडव लीला का शुभारंभ हो गया है। रविवार को लक्ष्मी नारायण मंदिर से पांडवों के अस्त्र-शस्त्र विधि-विधान के साथ लाए गए। स्नान के उपरांत पंडित कान्ता प्रसाद शैली द्वारा बाणों पर प्राण प्रतिष्ठा की गई, जिसके बाद लीला का आकर्षण और अधिक बढ़ गया। आयोजन के साथ ही दर्शकों की भीड़ उमड़ने लगी है और पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन गया है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
पांडव लीला उत्तराखंड की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है, जो आस्था, इतिहास और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक मानी जाती है। रानों गांव में यह आयोजन हर वर्ष पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न होता है और आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु और दर्शक इसमें शामिल होते हैं।
आधिकारिक जानकारी
बताया गया कि पांडव लीला का शुभारंभ 18 दिसंबर को भूमि के भूमियाल रावल देवता के मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ हुआ था। उसी दिन रावल देवता की मूर्ति (फर्श) को विधिवत पांडव चौक स्थित पूजा घर में स्थापित किया गया। रविवार को पांडवों के अस्त्र-शस्त्र आने के बाद लीला ने गति पकड़ी और नृत्य के साथ कार्यक्रम आगे बढ़ा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि पांडव लीला के दौरान पूरा गांव एक परिवार की तरह आयोजन में जुट जाता है। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक में उत्साह देखा जा रहा है और दूर-दराज से आए दर्शक भी लोक-संस्कृति को नजदीक से देख पा रहे हैं।
आयोजन समिति का पक्ष
पांडव लीला सांस्कृतिक कमेटी के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह भंडारी ने बताया कि आराध्य देव रावल देवता के आगमन के साथ शुक्रवार से पांडव लीला प्रारंभ हो गई थी। 21 दिसंबर को अस्त्र-शस्त्रों के आगमन के बाद अब बाणों के साथ पांडव नृत्य भी शुरू हो गया है, जिससे आयोजन और अधिक जीवंत हो उठा है।
आगे का कार्यक्रम
आयोजन के तहत 25 दिसंबर को सांवला वृक्ष का आगमन, 26 दिसंबर को राजसूय यज्ञ, 27 दिसंबर को द्रौपदी चीरहरण और 28 दिसंबर को चक्रव्यूह मंचन (सेरा कौतिक) की लीला प्रस्तुत की जाएगी। 29 दिसंबर को ग्राम भ्रमण और पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों के साथ गंगा स्नान होगा, जबकि 30 दिसंबर को रावल देवता के अपने मंदिर में विराजमान होने के साथ 13 दिनों से चल रही पांडव लीला का समापन किया जाएगा।







