
चकराता: देहरादून के चकराता तहसील के कंदाड़ गांव में ग्रामीणों ने एक सामूहिक बैठक में शादी और अन्य समारोहों में राइणियों (विवाहित महिलाओं) के लिए केवल तीन सोने के आभूषण पहनने का फैसला लिया है। यह निर्णय सोने की बढ़ती कीमतों और गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ को कम करने के लिए लिया गया। नियम का पालन न करने वाली महिलाओं पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। यह कदम जौनसार-बावर की परंपराओं को बनाए रखते हुए सामाजिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में है।
नया नियम और इसका उद्देश्य
ग्रामीणों ने तय किया कि विवाहित महिलाएं शादी और अन्य समारोहों में केवल नाक की फूली, कान के बुंदे, और मंगलसूत्र पहनेंगी। इस नियम का मकसद सोने के आभूषणों के अनावश्यक प्रदर्शन को रोकना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर दबाव कम करना है।
मुन्ना सिंह रावत, गांव के एक स्याणा, ने बताया, “जौनसार-बावर में पारंपरिक रूप से राइणियां सोने के गहने पहनती हैं, लेकिन सोने की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि यह परंपरा गरीब परिवारों के लिए बोझ बन रही है। हम चाहते हैं कि कोई भी महिला आर्थिक रूप से कमजोर महसूस न करे।” 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सोने की कीमतें पिछले पांच साल में 40% तक बढ़ी हैं, जिसने इस निर्णय को और जरूरी बना दिया।
नियम तोड़ने की सजा
बैठक में यह भी तय हुआ कि अगर कोई महिला इस नियम का उल्लंघन करती है, तो उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगेगा। यह नियम गांव के सभी परिवारों के लिए अनिवार्य होगा। टीकम सिंह रावत ने कहा, “हमने यह फैसला आम सहमति से लिया है ताकि सामाजिक एकता बनी रहे। जुर्माने का नियम सभी को गंभीरता से पालन करने के लिए प्रेरित करेगा।”
सामूहिक बैठक में शामिल लोग
बैठक में गांव के प्रमुख लोग शामिल थे, जिनमें मुन्ना सिंह रावत, टीकम सिंह रावत, गजेंद्र सिंह, अर्जुन सिंह, भगवती रणवीर, अमित, शूरवीर सिंह, अनिल सिंह चौहान, जीत सिंह, और भगत सिंह रावत, दौलत सिंह आदि शामिल थे। यह निर्णय सामुदायिक सहमति और सामाजिक समानता को ध्यान में रखकर लिया गया।
जौनसार-बावर की परंपराएं और चुनौतियां
जौनसार-बावर उत्तराखंड का एक जनजातीय क्षेत्र है, जहां सांस्कृतिक परंपराएं गहरी जड़ें रखती हैं। यहां राइणियों द्वारा सोने के आभूषण पहनना एक प्राचीन परंपरा है, जो सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि, सोने की बढ़ती कीमतों ने इस परंपरा को आर्थिक चुनौती बना दिया है। स्थानीय निवासी अर्जुन सिंह ने कहा, “हम अपनी परंपराओं का सम्मान करते हैं, लेकिन यह जरूरी है कि वे सभी के लिए बोझ न बनें। यह नियम हमारी एकता को मजबूत करेगा।”
सामाजिक प्रभाव
यह निर्णय न केवल आर्थिक बोझ कम करेगा, बल्कि सामाजिक समानता को भी बढ़ावा देगा। 2024 में उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों में सामाजिक सुधारों पर किए गए एक सर्वे के अनुसार, 60% ग्रामीण परिवार परंपरागत खर्चों को कम करने के पक्ष में हैं। कंदाड़ गांव का यह कदम अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। स्थानीय निवासी भगवती रणवीर ने कहा, “यह नियम हमारी बेटियों और बहनों के लिए सम्मान और समानता का संदेश है।”







