
देहरादून: भारत में पहली बार हाथियों की गणना पारंपरिक अनुमान विधियों के बजाय डीएनए आधारित विज्ञानी पद्धति से की गई है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वर्ष 2025 में कराई गई अखिल भारतीय समन्वित हाथी गणना (डीएनए बेस्ड आल इंडिया सिंक्रोनाइज्ड एलिफेंट एस्टिमेशन) ने देश में हाथियों की वास्तविक आबादी और वितरण का एक विश्वसनीय आधार तैयार किया है। इस गणना के अनुसार, भारत में कुल 22,446 हाथी हैं, जो 2017 की गणना (27,312) से कम है। कर्नाटक में सर्वाधिक 6,013 हाथी पाए गए, जबकि उत्तराखंड 1,792 हाथियों के साथ पांचवें स्थान पर है।
डीएनए आधारित गणना: एक नई शुरुआत
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ), देहरादून में मंगलवार को आयोजित वार्षिक शोध संगोष्ठी में पर्यावरण वन मंत्रालय के अपर महानिदेशक डॉ. ईराच भरूचा, इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस के महानिदेशक डॉ. एसपी यादव, और डब्ल्यूआइआइ के निदेशक डॉ. जीएस भारद्वाज ने गणना के आंकड़े जारी किए।
पहले हाथियों की गिनती प्रत्यक्ष अवलोकन या मल के नमूनों की घनत्व विधियों से की जाती थी, जिसमें त्रुटि की संभावना रहती थी। इस बार डीएनए मार्क-रिकैप्चर तकनीक का उपयोग किया गया। इसमें:
- हाथियों के मल से डीएनए निकालकर प्रत्येक हाथी की जेनेटिक आइडी बनाई गई।
- इससे दोहराव की समस्या खत्म हुई और प्रत्येक हाथी की अद्वितीय पहचान सुनिश्चित हुई।
- गणना से हाथियों की सटीक संख्या और प्रवास पैटर्न का पता चला।
राज्यवार हाथी आबादी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हाथियों की संख्या राज्यवार इस प्रकार है:
- कर्नाटक: 6,013
- असम: 4,159
- तमिलनाडु: 3,136
- केरल: 2,785
- उत्तराखंड: 1,792
- ओडिशा: 912
- मेघालय: 677
- बंगाल-उत्तर: 676
- अरुणाचल प्रदेश: 617
- छत्तीसगढ़: 451
- उत्तर प्रदेश: 257
- नगालैंड: 252
- झारखंड: 217
- त्रिपुरा: 153
- आंध्र प्रदेश: 120
- मध्य प्रदेश: 97
- महाराष्ट्र: 63
- बंगाल-दक्षिण: 31
- मिजोरम: 16
- बिहार: 13
- मणिपुर: 9
क्षेत्रीय वितरण
हाथियों के चार प्रमुख पारिस्थितिक क्षेत्रों में उनकी सघनता इस प्रकार है:
- पश्चिमी घाट: 11,934 हाथी
- उत्तर-पूर्वी पहाड़ व ब्रह्मपुत्र समतल: 6,559 हाथी
- शिवालिक व गंगा मैदानी क्षेत्र: 2,062 हाथी
- मध्य भारत व पूर्वी घाट: 1,891 हाथी
महत्व और चुनौतियां
यह डीएनए आधारित गणना न केवल हाथियों की सटीक संख्या प्रदान करती है, बल्कि उनके संरक्षण के लिए नीतियां बनाने में भी मदद करेगी। हालांकि, हाल के दिनों में उत्तराखंड के हरिद्वार डिवीजन में चार हाथियों की मौत ने वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियों को उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि डीएनए डेटा से प्रवास पैटर्न और खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान कर सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जा सकता है।
संरक्षण की दिशा में कदम
यह गणना भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक मील का पत्थर है। डीएनए तकनीक ने हाथी आबादी की सटीक जानकारी प्रदान की है, जो भविष्य में संरक्षण रणनीतियों को और प्रभावी बनाएगी। पर्यावरण मंत्रालय और डब्ल्यूआइआइ ने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। साथ ही, उत्तराखंड जैसे राज्यों में बिजली के तारों और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे खतरों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।





