
देहरादून: महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम की दिशा में केंद्र सरकार ने अहम फैसला लेते हुए एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) वैक्सीन को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (यूआइपी) में शामिल करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद उत्तराखंड में भी तैयारियां तेज कर दी गई हैं। इसी क्रम में देहरादून स्थित दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल से स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण का रोस्टर जारी कर दिया गया है, ताकि कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एचपीवी एक सामान्य वायरस है, जो आगे चलकर महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर का कारण बन सकता है। यह कैंसर देश में महिलाओं में कैंसर से होने वाली मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। एचपीवी वैक्सीन बीमारी होने से पहले सुरक्षा प्रदान करती है, जिससे कैंसर का जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल की प्राचार्या और वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. गीता जैन ने बताया कि सरकार की ओर से एचपीवी वैक्सीन को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किया जाना महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भी स्वास्थ्य विभाग इस फैसले को लेकर सतर्क और सक्रिय है तथा प्रशिक्षण के जरिए जमीनी स्तर पर तैयारी की जा रही है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
चिकित्सकों और महिला स्वास्थ्य से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होने से एचपीवी वैक्सीन को लेकर भरोसा बढ़ेगा। इससे अभिभावकों और किशोरियों में झिझक कम होगी और टीकाकरण को लेकर जागरूकता भी बढ़ेगी।
आंकड़े और तथ्य
सरकारी योजना के तहत एचपीवी वैक्सीनेशन का मुख्य लक्ष्य 9 से 14 वर्ष की किशोरियां होंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी आयु वर्ग में वैक्सीन का प्रभाव सबसे अधिक होता है। वर्तमान में यह वैक्सीन निजी क्षेत्र में उपलब्ध है, जबकि कुछ राज्यों में इसे निशुल्क या रियायती दरों पर दिया जा रहा है। यूआइपी में शामिल होने से यह वैक्सीन देशभर में व्यापक रूप से सुलभ हो सकेगी।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह कार्यक्रम प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में सर्वाइकल कैंसर के मामलों और इससे होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है। इसके साथ ही समाज में एचपीवी वैक्सीनेशन को लेकर जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि भ्रांतियों और संकोच को दूर किया जा सके।







