
देहरादून: राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में पहली बार आयोजित उत्तरायणी कौथिक महोत्सव ने शहर को चार दिनों तक उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के रंगों से सराबोर कर दिया। सेवा संकल्प फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस महोत्सव में प्रदेश के विभिन्न अंचलों की लोककला, गीत-संगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियां एक ही मंच पर देखने को मिलीं। बड़ी संख्या में पहुंचे दर्शकों ने आयोजन को ऐतिहासिक बताते हुए इसे राजधानी के सांस्कृतिक कैलेंडर का यादगार अध्याय माना। महोत्सव का समापन समारोह खास तौर पर भावनात्मक रहा, जिसने कार्यक्रम को लंबे समय तक याद किए जाने वाला बना दिया।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
उत्तरायणी पर्व उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा एक प्रमुख लोकपर्व है। इसी परंपरा को राजधानी में व्यापक मंच देने के उद्देश्य से इस वर्ष पहली बार परेड ग्राउंड में उत्तरायणी कौथिक महोत्सव का आयोजन किया गया। चार दिनों तक चले इस आयोजन में पहाड़ की लोकधुनों, पारंपरिक नृत्यों और सांस्कृतिक झलकियों ने शहरी दर्शकों को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
महोत्सव के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। इस दौरान मंच से मुख्यमंत्री की पत्नी गीता धामी ने भी जनता को संबोधित किया। उनके संबोधन के दौरान जब उन्होंने मातृशक्ति, परिवार और त्याग की भूमिका पर बात की तो वे भावुक हो गईं। उनकी आंखों में छलकते भावों ने पूरे पंडाल को गंभीर और संवेदनशील माहौल में बदल दिया।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह का आयोजन राजधानी में पहले कभी नहीं देखा गया। दर्शकों के अनुसार, उत्तरायणी कौथिक ने न सिर्फ लोक संस्कृति को मंच दिया, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी परंपराओं से जोड़ने का काम किया। कई लोगों ने गीता धामी के संबोधन को कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक और प्रभावशाली क्षण बताया।
आंकड़े और तथ्य
गीता धामी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रदेश में युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए नकल विरोधी कानून लागू किया गया और 26 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी रोजगार दिए गए। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री ने बीते चार वर्षों में निजी जीवन से अधिक समय प्रदेश की सेवा को दिया है।
आगे क्या होगा
आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि जनता की सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए भविष्य में उत्तरायणी कौथिक को और व्यापक स्वरूप में आयोजित करने की योजना पर विचार किया जा सकता है, ताकि उत्तराखंड की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती से प्रस्तुत किया जा सके।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में उत्तरायणी मेलों और कौथिकों का आयोजन पारंपरिक रूप से होता रहा है, लेकिन राजधानी देहरादून में इतने बड़े स्तर पर एक साथ सभी अंचलों की सांस्कृतिक झलक पहली बार देखने को मिली।
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