
देहरादून में उत्तराखंड वन विभाग ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उप वन क्षेत्राधिकारी कुलदीप सिंह पंवार को निलंबित कर दिया है। आरोप है कि उन्होंने सरकारी अभिलेखों को अनधिकृत रूप से प्राप्त किया और उनका दुरुपयोग किया, साथ ही सूचना का अधिकार अधिनियम से जुड़े नियमों की अनदेखी की। विभागीय जांच में यह भी सामने आया कि जिन दस्तावेज़ों का उपयोग किया गया, वे न तो किसी सक्षम अधिकारी द्वारा प्रमाणित थे और न ही वैधानिक प्रक्रिया के तहत प्राप्त किए गए थे। मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी दस्तावेज़ों की गोपनीयता से जुड़ा होने के कारण गंभीर माना गया, जिसके बाद यह कार्रवाई की गई।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई, जब वन संरक्षक अनुसंधान वृत्त, उत्तराखंड (हल्द्वानी) को एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र में आरोप लगाया गया था कि उप वन क्षेत्राधिकारी कुलदीप सिंह पंवार के पास ऐसे विभागीय दस्तावेज़ मौजूद हैं, जो उन्हें आधिकारिक रूप से कभी उपलब्ध नहीं कराए गए। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि ये दस्तावेज़ न तो किसी सक्षम अधिकारी द्वारा प्रमाणित थे और न ही सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत प्राप्त किए गए थे। प्रारंभिक जांच में मामला प्रथम दृष्टया गंभीर पाया गया।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
जांच रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने पाया कि सरकारी अभिलेखों की गोपनीयता भंग की गई है, जो न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है बल्कि विभाग की कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, कुलदीप सिंह पंवार से 11 नवंबर 2025 को स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन तय समय सीमा के भीतर कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। बाद में भी वे दस्तावेज़ों के स्रोत और वैधानिक प्रक्रिया स्पष्ट नहीं कर सके।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक (HoFF), देहरादून ने निलंबन आदेश जारी किया। आदेश में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया सरकारी दस्तावेज़ों का अनधिकृत उपयोग साबित होता है, जो विभागीय अनुशासन के खिलाफ है। निलंबन अवधि के दौरान संबंधित अधिकारी को नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा और उन्हें वन संरक्षक, शिवालिक वृत्त उत्तराखंड कार्यालय से संबद्ध रखा गया है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई को प्रशासनिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से विभाग में नियमों के पालन का संदेश जाएगा। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि मामले की पूरी सच्चाई विस्तृत जांच के बाद ही सामने आ पाएगी।
आंकड़े और तथ्य
जांच रिपोर्ट के अनुसार यह कृत्य उत्तराखंड राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली 2002 के नियम 3(1), 3(2) और 9 का उल्लंघन माना गया है। इसके साथ ही भारतीय दंड संहिता (BNS) की धाराओं 303, 61 और 356 सहित अन्य सुसंगत धाराओं के अंतर्गत इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ दस्तावेज़ों में निजी व्यक्ति से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी शामिल थी, जिसे अनधिकृत रूप से उपयोग किया गया।
आगे क्या होगा
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई प्रारंभिक जांच के आधार पर की गई है और मामले की विस्तृत विभागीय जांच अभी जारी है। यदि जांच में आरोप पूरी तरह साबित होते हैं, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ और भी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही, भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सरकारी दस्तावेज़ों की सुरक्षा और RTI नियमों के पालन को और सख्ती से लागू करने के संकेत दिए गए हैं।







