
चंपावत: चंपावत जिले की लोहाघाट विधानसभा क्षेत्र की आदर्श पंचायत अमौली में शिक्षा को लेकर एक सराहनीय पहल सामने आई है। शीतकालीन अवकाश के दौरान जब पहाड़ी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे पढ़ाई से दूर हो जाते हैं, ऐसे समय में ग्राम प्रधान और स्थानीय शिक्षकों ने पंचायत भवन में कक्षा एक से 12 तक के छात्र-छात्राओं को रोज़ाना लगभग चार घंटे निशुल्क शिक्षा देने का निर्णय लिया है। इस पहल से न केवल बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता बनी हुई है, बल्कि ग्रामीण शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक संदेश भी गया है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में हर साल 1 जनवरी से 31 जनवरी तक शीतकालीन अवकाश रहता है। इस अवधि में बच्चों की पढ़ाई अक्सर प्रभावित होती है और लंबे अंतराल के कारण उनकी शैक्षणिक गति धीमी पड़ जाती है। इसी चुनौती को देखते हुए अमौली पंचायत में ग्राम स्तर पर ही समाधान निकालने का प्रयास किया गया है।
आधिकारिक जानकारी
ग्राम प्रधान निशा भट्ट के नेतृत्व में पंचायत के चार स्थानीय शिक्षकों ने मिलकर पंचायत भवन में निशुल्क क्लासेस शुरू की हैं। इन कक्षाओं में कक्षा एक से 12 तक के बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाया जा रहा है। शिक्षक बिना किसी मानदेय के समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं, ताकि बच्चों की पढ़ाई छुट्टियों के कारण बाधित न हो।
स्थानीय प्रतिक्रिया
अभिभावकों का कहना है कि इस पहल से बच्चों की पढ़ाई में निरंतरता बनी हुई है और वे छुट्टियों के दौरान भी अनुशासित दिनचर्या में रह पा रहे हैं। ग्रामीणों ने इसे बच्चों के भविष्य के लिए बेहद उपयोगी कदम बताया और कहा कि पंचायत, शिक्षक और अभिभावक मिलकर काम करें तो सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।
विशेषज्ञ / शिक्षक की भूमिका
इस शिक्षण अभियान में गांव के ही शिक्षक सुरेश चंद्र भट्ट, हिमांशु भट्ट, गिरीश चंद्र भट्ट और मोहन चंद्र भट्ट प्रतिदिन चार घंटे बच्चों को पढ़ा रहे हैं। पढ़ाई में पाठ्यक्रम की पुनरावृत्ति के साथ-साथ विषयगत समझ, अनुशासन और अध्ययन की निरंतरता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
आंकड़े / तथ्य
शीतकालीन अवकाश 1 जनवरी से 31 जनवरी तक रहता है। कक्षा 1 से 12 तक के छात्र-छात्राएं इन क्लासेस में शामिल हैं। रोज़ाना लगभग चार घंटे निशुल्क पढ़ाई कराई जा रही है। चार शिक्षक बिना मानदेय के सेवा दे रहे हैं।
आगे क्या होगा
ग्राम पंचायत का प्रयास है कि यह पहल पूरे शीतकालीन अवकाश तक जारी रहे। यदि परिणाम सकारात्मक रहे, तो भविष्य में इसे अन्य पंचायतों के लिए भी एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता और निरंतरता बनी रहे।







