
नैनीताल: भीमताल के जून एस्टेट क्षेत्र को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह के पेड़ों के कटान या कटाई की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह अंतरिम रोक वन विभाग, स्थानीय निकायों और विकास प्राधिकरणों सहित सभी संबंधित एजेंसियों पर समान रूप से लागू होगी। अदालत ने इसे एक संवेदनशील जलागम क्षेत्र मानते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं, जिससे क्षेत्र में चल रही गतिविधियों पर फिलहाल विराम लग गया है।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
यह मामला भीमताल के जोन्स एस्टेट और जून एस्टेट क्षेत्र से जुड़ा है, जिसे पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। याचिकाकर्ता पीटर स्मेटा की ओर से दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस क्षेत्र में निर्माण और पेड़ कटान से जलागम क्षेत्र को नुकसान पहुंच सकता है। पूर्व में भी इस इलाके को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं सामने आती रही हैं, जिसके चलते यह मामला व्यापक जनहित से जुड़ गया है।
आधिकारिक जानकारी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने एक पुरानी रिपोर्ट पर विशेष संज्ञान लिया। यह रिपोर्ट तत्कालीन उप वन संरक्षक मनोज चंद्रन द्वारा तैयार बताई गई थी, जिसमें जोन्स एस्टेट को ‘वन पंचायत’ और महत्वपूर्ण ‘जलागम क्षेत्र’ के रूप में वर्णित किया गया है। हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस पर न तो हस्ताक्षर हैं और न ही आधिकारिक मुहर।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि भीमताल क्षेत्र की हरियाली और जल स्रोत पूरे इलाके के लिए जीवनरेखा हैं। उनका मानना है कि यदि इस क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण और पेड़ कटान हुआ, तो इसका सीधा असर जलस्तर और पर्यावरण संतुलन पर पड़ेगा। लोगों ने कोर्ट के रुख का स्वागत करते हुए इसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए जरूरी कदम बताया।
आंकड़े / तथ्य
मामला एक जनहित याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंचा। क्षेत्र को वन पंचायत और जलागम क्षेत्र बताया गया है। अगली सुनवाई की तारीख 25 फरवरी तय की गई है।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि एक पुराने समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के संदर्भ में संबंधित प्रकाशक से तथ्यात्मक स्थिति की पुष्टि की जाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या इतने संवेदनशील जलागम क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए। अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी, तब तक क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने और पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचाने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।





