
देहरादून: उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने बदरी-केदार धाम क्यूआर कोड प्रकरण की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी मामले का न्यायालय में लंबित होना सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचना देने में बाधा नहीं है। आयोग ने बदरीनाथ कोतवाली के लोक सूचना अधिकारी को चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में केवल न्यायालय का हवाला देकर सूचना देने से इनकार न किया जाए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह मामला वर्ष 2023 में बदरीनाथ और केदारनाथ धामों में लगाए गए क्यूआर कोड से जुड़ा है। इस प्रकरण से संबंधित सूचना आरटीआई के तहत मांगी गई थी, लेकिन लोक सूचना अधिकारी की ओर से यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया गया कि मामला न्यायालय में लंबित है। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए सूचना आयोग में अपील दायर की गई थी।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
राज्य सूचना आयुक्त कुशला नंद ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले की जांच पूरी हो चुकी है, तो केवल उसके न्यायालय में लंबित होने के आधार पर सूचना रोकी नहीं जा सकती। उन्होंने कहा कि आरटीआई अधिनियम के तहत केवल वही सूचनाएं रोकी जा सकती हैं, जिनके प्रकाशन पर न्यायालय की ओर से स्पष्ट रोक लगी हो या जिनसे जांच अथवा अभियोजन की प्रक्रिया प्रभावित होती हो।
आयोग ने बदरीनाथ कोतवाली के लोक सूचना अधिकारी को भविष्य के लिए सतर्क करते हुए चेतावनी जारी की।
स्थानीय प्रतिक्रिया
आयोग के फैसले पर बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने संतोष जताया है। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से आरटीआई अधिनियम की मंशा स्पष्ट होती है और क्यूआर कोड प्रकरण में उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।
आगे क्या होगा
सूचना आयोग के आदेश के बाद अब संबंधित विभागों पर आरटीआई के तहत मांगी गई सूचनाएं उपलब्ध कराने का दबाव बढ़ेगा। साथ ही, इस फैसले को भविष्य में उन मामलों के लिए भी नजीर माना जा रहा है, जहां न्यायालय में लंबित होने का हवाला देकर सूचना देने से इनकार किया जाता रहा है।







