
अल्मोड़ा: जिले के पाटिया गांव में गोवर्धन पूजा के अवसर पर परंपरागत पाषाण युद्ध ‘बग्वाल’ आयोजित किया गया। यह अनोखी परंपरा जनपद मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की पहचान बन चुकी है। बग्वाल देखने के लिए दूर-दूर से लोग पाटिया और आसपास के गांवों में पहुंचते हैं।
परंपरागत तरीके से खेली गई बग्वाल
इस बार भी बग्वाल को परंपरागत तरीके से आयोजित किया गया। शाम के समय गौधूली से पूर्व गाय की पूजा के बाद पचपघटिया गदेरे में बग्वाल शुरू हुई। पाटिया, भटगांव और कसून गांव के रणबांकुरों ने कोटयूड़ा की टीम और बड़खुना गांव के रणबांकुरों के साथ मुकाबला किया। यह युद्ध लगभग 55 मिनट तक चला, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पत्थरों की बरसात की।
चोटें और उपचार
इस बार के युद्ध में पांच लोगों को मामूली चोटें आईं। उनका बिच्छू घास के माध्यम से उपचार किया गया। पाटिया के रणबांकुरे देवेंद्र पिलख्वाल और कुलदीप पिलख्वाल ने गदेरे में जाकर पानी पीकर पाटिया खाम की जीत का ऐलान किया। इस दौरान अल्मोड़ा समेत दूर-दूर से आए सैकड़ों लोग बग्वाल के रोमांच का गवाह बने।
बग्वाल की किंवदंती
क्षेत्रवासियों के अनुसार, वर्षों पहले काश्तकारों ने अपनी फसलों और जानवरों की रक्षा के लिए अत्याचारी राजा बग्वाली को पत्थरों से मार भगाया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद यह स्थान ‘पचघटिया’ के नाम से जाना जाने लगा।
युवाओं ने बढ़-चढ़ कर लिया भाग
आज भी पाटिया और आसपास के गांवों के युवा चार समूहों (खाम) में बग्वाल खेलते हैं: पाण्डे खाम, पिलख्वाल खाम, हरड़िया खाम और कोट्यूली खाम। इसमें दोनों ओर से पत्थर एक-दूसरे पर बरसाए जाते हैं।
समापन परंपरा
पाषाण युद्ध के समापन पर बुजुर्गों के आदेश अनुसार रणबांकुरे नदी में पानी पीकर और एक-दूसरे पर पानी छिड़क कर बग्वाल समाप्त करते हैं। चोट लगने पर बिच्छू घास का लेप लगाया जाता है।
यह परंपरा न केवल युवाओं में उत्साह भरती है, बल्कि पाटिया गांव की सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक गौरव को भी संरक्षित रखती है।







