
ऋषिकेश: देवभूमि उत्तराखंड की तीर्थनगरी ऋषिकेश, जहां गंगा की निर्मल धारा बहती है, अब धीरे-धीरे प्रदूषण की चपेट में आती जा रही है। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) की हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ऋषिकेश की हवा में धूल और वाहनों से निकलने वाला धुआं सबसे बड़ा प्रदूषण कारक बन गया है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत PCB ने देहरादून, काशीपुर और ऋषिकेश में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए अध्ययन और कार्ययोजनाएं शुरू की हैं। रिपोर्ट में पाया गया है कि ऋषिकेश में हवा की गुणवत्ता खराब होने का 40% कारण धूल है, जबकि वाहनों का धुआं 17% तक जिम्मेदार है।
चारधाम यात्रा मार्ग और वाहनों से बढ़ता प्रदूषण
ऋषिकेश चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार है, जहां से हर दिन हजारों वाहन गुजरते हैं। इन वाहनों से निकलने वाला धुआं और सड़कों पर उड़ती धूल शहर की हवा को प्रदूषित कर रही है। इसके अलावा घरेलू कारणों से 14%, औद्योगिक गतिविधियों से 9%, और अन्य छोटे स्रोतों से लगभग 10% प्रदूषण बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य पर असर और PM10 का खतरा
PCB के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार, हवा की गुणवत्ता खराब होने का प्रमुख कारण पार्टिकुलेट मैटर (PM-10) और PM-2.5 है।
“PM-10 धूल से और PM-2.5 धुएं से उत्पन्न होते हैं। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों और हृदय को नुकसान पहुंचाते हैं,”
उन्होंने कहा।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए जा रहे कदम
ऋषिकेश में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाए जा रहे हैं:
- सड़कों की मशीनों से सफाई की व्यवस्था की जा रही है।
- हरियाली क्षेत्र बढ़ाने और पौधारोपण पर जोर दिया जा रहा है।
- यातायात वाले क्षेत्रों में ग्रीन बेल्ट ज़ोन विकसित किए जा रहे हैं।
- नगर निगम, परिवहन विभाग, PCB और कृषि विभाग को 94 करोड़ रुपये से अधिक की राशि आवंटित की गई है।
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में बेहतर प्रदर्शन
PCB के अनुसार, निरंतर प्रयासों के चलते पिछले एक वर्ष में सुधार देखा गया है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2025 में ऋषिकेश देशभर में 14वें स्थान पर रहा, जबकि देहरादून को 19वां स्थान प्राप्त हुआ। यह इस बात का संकेत है कि यदि योजनाओं को निरंतर लागू किया जाए तो ऋषिकेश की हवा फिर से शुद्ध और जीवनदायी बन सकती है।







